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    Karnal: विदेशों से मुंह मोड़ रहे युवा

    करनाल (सच कहूँ/ललित)। Karnal: कभी विदेश में पढ़ाई भारतीय छात्रों के लिए एक बड़ा सपना हुआ करता था। अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों की यूनिवर्सिटियां उनके लिए आकर्षण का केंद्र थीं, लेकिन अब यह आकर्षण धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है। वर्ष 2024 में विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में करीब 25% की गिरावट दर्ज की गई है, जिसने शिक्षा जगत को चौंका दिया है। Karnal

    यह गिरावट ऐसे समय में आई है जब बीते एक दशक में भारतीय छात्रों ने विदेशी विश्वविद्यालयों में बड़ी मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी और चीनी छात्रों को भी पीछे छोड़ दिया था। लेकिन इस बार बदलाव की दिशा अलग है- अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे तीनों प्रमुख देशों में भारतीय छात्रों की संख्या एक साथ घट गई है, जो पिछले पांच वर्षों में पहली बार हुआ है। आंकड़े इस बदलाव की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं- अमेरिका में 34%, कनाडा में 32% और ब्रिटेन में 26% की कमी दर्ज की गई है। इस बदलाव के पीछे कई अहम कारण हो सकते हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण है वैश्विक आर्थिक हालात और बढ़ती महँगाई।

    अमेरिका और ब्रिटेन में पहले से ही ट्यूशन फीस और रहने का खर्च बहुत अधिक है और अब भारतीय रुपये की गिरती कीमत ने इस खर्च को और भारी बना दिया है। वहीं कनाडा, जो कभी सस्ती शिक्षा और आप्रवासन नीति के लिए जाना जाता था, अब सख्त वीजा नियमों और सीमित नौकरी के अवसरों के कारण अपनी चमक खो रहा है। कोविड-19 के बाद से कई देशों ने अपने वीजा और इमिग्रेशन से जुड़ी नीतियों में कड़ाई कर दी है, जिससे छात्रों को विदेश जाकर पढ़ाई और फिर वहीं नौकरी पाने में कठिनाई हो रही है। इसके विपरीत भारत में शिक्षा व्यवस्था का स्तर लगातार सुधर रहा है। आईआईटी, आईआईएम जैसे संस्थानों की गुणवत्ता पहले से कहीं बेहतर हो चुकी है और कई निजी विश्वविद्यालय भी अब वैश्विक स्तर की सुविधाएं देने लगे हैं। Karnal

    इसके अलावा आॅनलाइन शिक्षा के विकल्पों ने भी विदेशी डिग्रियों की चमक को कम कर दिया है। आज का छात्र यह सोचने लगा है कि जब देश में ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध है, तो फिर विदेश जाकर लाखों रुपये क्यों खर्च किए जाएं? अब सवाल यह भी है कि क्या इस बदलाव का सामाजिक और सांस्कृतिक असर भी पड़ेगा? विदेशी शिक्षा ने भारतीय युवाओं को सिर्फ ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें वैश्विक नजरिया, आत्मविश्वास भी प्रदान किया है। विदेश में पढ़कर लौटे छात्रों ने भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत किया है और भारत की वैश्विक छवि को निखारा है। लेकिन अगर यह रुझान लगातार घटता रहा, तो क्या भारत उस वैश्विक प्रभाव को बरकरार रख पाएगा, जो उसने वर्षों में कमाया है? यह बदलाव संकेत देता है कि अब समय आ गया है जब भारत को खुद को एक वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए। Karnal

    यदि भारत में विश्वस्तरीय शिक्षा, शोध और करियर के अवसर उपलब्ध कराए जाएं, तो न केवल भारतीय छात्र यहीं रुकेंगे, बल्कि विदेशी छात्र भी भारत आने में रुचि दिखाएँगे। इससे भारत का शिक्षा क्षेत्र भी मजबूत होगा और अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा। यह वह समय है जब हमें चुनौतियों को अवसर में बदलते हुए शिक्षा में आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाने चाहिए, ताकि भारत न केवल अपने छात्रों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए शिक्षा का एक नया और भरोसेमंद केन्द्र बन सके।
                                                                                                      -(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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