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    91 साल के बंता सिंह ने संजो कर रखी हुई है सतगुरु जी की प्रेम निशानियां

    Sri-Jalalana-Sahib
    91 साल का बंता सिंह बना चर्चा का विषय

    ओढां, राजू। ‘सच-कहूँ’ अपने पाठकों को रुहानी यादों से रू-ब-रू करवा (Sri Jalalana Sahib) रहा है। आज आपको 91 वर्षीय एक ऐसे सत्संगी से अवगत करवा रहे हैं, जिन्हें तीनों बॉडियों के पावन दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने मुर्शिद के पावन कर-कमलों से प्राप्त की गई प्रेम निशानियां आज भी सप्रेम सहजकर रखी हुई है। जब उनसे बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज के चोजों के बारे पूछा गया तो उन्होंने सबसे पहले वो प्रेम निशानियां दिखाई जो उन्होंने बेपरवाह जी से प्राप्त की थी। पावन गुरु नगरी श्री जलालआणा साहिब के निवासी प्रेमी बंता सिंह इन्सां ने बताया कि मैंने सन् 1956 में बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज से नामशब्द लिया था। उस समय मेरी उम्र 18 वर्ष की थी। उस समय मलोट में आश्रम का निर्माण कार्य चल रहा था। जिसमें सेवा करने के लिए मैं और मेरा मित्र जीता सिंह दोनों पहुंच गए। वहां पर हम दोनों ने करीब डेढ़ माह तक रहकर खूब सेवा की।

    उस समय दिन-रात सेवा चलती थी। एक बार बेपरवाह जी ने वचन फरमाए कि ‘वरी तुम दोनों घर चले जाओ, जी ना लगे तो वापस आ जाना।’ जिसके बाद हम अपने गांव आ गए और बेपरवाह जी सरसा चले गए। हम दोनों 4-5 दिन तक घर पर रहे, लेकिन हमारा मन नहीं लगा। एक दिन हम दोनों पैदल ही शाह मस्ताना जी धाम सरसा के लिए चल पड़े। मेरी जेब में 3 पैसे थे, जबकि जीता सिंह के पास 2 पैसे। रास्ते में गांव खैरेकां के निकट हमें प्रेमी हजारा लाल जीप लेकर मिल गए। हम दोनों को भागते देख उन्होंने हमें जीप पर चढ़ा लिया। बेपरवाह जी आश्रम में सेवादारों को मिट्ठी झिड़क देते हुए कह रहे थे ‘इन सबको यहां से बाहर कर दो।’ इसी दौरान बेपरवाह जी किसी बात पर सेवादार पलटू राम पर नाराज हुए, हालांकि बाद में उन्होंने उन्हें आशीर्वाद भी दिया।

    हमारी तरफ देखकर बेपरवाह जी बोले कि ‘क्या तुम दोनों यहां रहकर सेवा करना चाहते हो ?’ जिस पर हमने हामी भर दी। जिसके बाद हम वहीं रहकर सेवा करने लग गए। बेपरवाह जी जब मलोट के लिए दोबारा रवाना हुए तो हमें यह कहकर गए कि ‘हम मलोट जा रहे हैं, जी न लगे तो आ जाना।’ हमारा मन तो बेपरवाह जी के हर पल दर्शन करने को आतुर रहता था। हमने गोबिंद माली को कहा कि हम तो मलोट जा रहे हैं। जिस पर उन्होंने हमारे साथ सब्जियां बांध दी और कहा कि बेपरवाह जी को दे देना। जब हम बस द्वारा मलोट पहुंचे तो बेपरवाह जी पहले से ही गेट पर खड़े थे। बेपरवाह जी हमसे बोले कि ‘वरी आ गए दोनों।’ हम दोनों वहां फिर सेवा में जुट गए। कुछ दिन बाद बेपरवाह जी बोले कि ‘वरी सभी ने यहां रहकर सेवा करनी है, हम सरसा जा र हैं।’

    ‘पुट्टर पगड़ी नहीं उतारना, हुकम मानना है’:-

    प्रेमी बंता सिंह ने बताया कि मलोट में आश्रम बनने के बाद बेपरवाह जी ने हम सभी सेवादारों को पास बुलाया और अपने हाथोें से सभी को पगड़ी बांधते हुए एक-एक बनियान भी दी। बेपरवाह जी ने फरमाया कि ‘वरी जिनको हमने पगड़ी बांधी है वे अपने घरों को चले जाएं।’ लेकिन मैं और जीता सिंह घर नहीं जाना चाहते थे। बेपरवाह जी हम दोनों को जलालआणिये कहकर बुलाते थे। हम दोनों बेपरवाह जी की हजूरी में पेश हुए और बोले कि ‘बाबा जी ये पगड़ी और बनियान वापस ले लो, हमें यहां से नहीं जाना।’ ये सुनकर बेपरवाह जी बोले कि ‘पुट्टर पगड़ी नहीं उतारना, हुकम मानना है।’ जिसके बाद हमने बेपरवाह जी से ये कहा कि ‘हम पर हमेशा दया-मेहर रखना।’ जिस पर बेपरवाह जी बोले ‘बिल्कुल दया-मेहर रहेगी। अब घर चले जाओ, जी न लगे तो वापस आ जाना।’ एक बार बेपरवाह जी ने एक लकड़ी का गल्ला व कंबल शाही खजाने के रूप में दिया। ये शाही खजाना प्रेमी बंता सिंह इन्सां आज भी सहजकर रखे हुए है।

    बेपरवाह सार्इं जी के दर्शन करने आए हैं

    बंता सिंह इन्सां बेपरवाह जी की रुहानी यादों को बताते-बताते बीच में भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि जब बेपरवाह जी ने चोला बदला तो उस समय मैं गांव चोरमार के आश्रम में था। मुझे एक सेवादार ने जब इस बारे बताया तो मैं उसी समय सरसा पहुंच गया। बेपरवाह जी की पावन देह दर्शनार्थ रखी गई थी और परमपिता शाह सतनाम जी महाराज उनके पास बैठे थे। बंता सिंह इन्सां के मुताबिक उस समय दिल्ली से कुछ कव्वाल बेपरवाह जी के अंतिम दर्शन करने आए थे। उन्होंने कहा कि वे जिस फकीर की कब्र पर सेवा करते हैं वहां पर अलसुबह 3 बजे आवाज आई कि ‘आप लोगों ने हमारी बहुत सेवा की, लेकिन मेरा सच्चा पिता यहां आया था, आपने उनकी कद्र नहीं की।’ इसलिए वे यहां बेपरवाह जी के दर्शन करने आए हैं।

    पिताजी बस मेरी ओड़ निभा देना

    बंता सिंह इन्सां ने पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से रुहानी जाम ग्रहण करते हुए शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेलफेयर फोर्स विंग की वर्दी भी ली हुई है। बंता सिंह इन्सां का नाते-पोतियों से भरा-पूरा परिवार है। बंता सिंह ने कहा कि अब तो पूज्य हजूर पिता जी से यही अरदास है कि ‘बस मेरी ओड़ निभ जाए।’ बंता सिंह के पौत्र सोनू इन्सां ने बताया कि उनके दादा जी उन्हें बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज से जुड़ी अनेकों बातें बताते रहे हैं।

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