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    नर मृग के पेट में पैदा होती है कस्तूरी

    कस्तूरी मृग को ‘हिमायलन मस्क डियर’ के नाम से भी जाना जाता है। वैसे इसका वैज्ञानिक नाम ‘मास्कस क्राइसोगास्त’ है। अपनी आकर्षक खूबसूरती के साथ यह जीव नाभि से निकलने वाली अप्रतिम खुशबू के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है। इस मृग की नाभि में गाढ़ा तरल (कस्तूरी) होता है जिसमें से मनमोहक खुशबू की धारा बहती है। अब तक हिरणों की 60 से भी अधिक किस्मों का अध्ययन किया जा चुका है। इन किस्मों में एक ऐसा भी हिरण होता है, जिससे कस्तूरी प्राप्त की जाती है। इसे कस्तूरी मृग कहते है और यह मोशिडे परिवार का प्राणी है। कस्तूरी मृग एकांत में रहने वाला बहुत ही सीधा और छोटा सा जानवर होता है। यह साइबेरिया से लेकर हिमालय तक के पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाता है। इनके कान बड़े होते हैं, लेकिन पूंछ बहुत ही छोटी होती है।

    इनके सिर पर दस मृगों की भांति सींग नहीं होते, इनका रंग भूरा कत्थई होता है। कस्तूरी मृग की ऊंचाई 50 से 60 सेंटीमीटर (20-24 इंच) तक होती है। नर मृग के पेट में कस्तूरी पैदा करने वाला अंग होता है। नर हिरण के दांत बाहर निकले होते हैं। जो नीचे की ओर झुके होते हैं। कस्तूरी एक ऐसा पदार्थ है, जिसमें तीखी गंध होती है। कस्तूरी मृग के पेट की त्वचा के नीचे नाभि के पास एक छोटा-सा थैला होता है, जिसमें कस्तूरी का निर्माण होता रहता है। ताजी कस्तूरी गाढ़े द्रव के रूप में होती है, लेकिन सूखने पर दानेदार चूर्ण के रूप में बदल जाती है। कस्तूरी का प्रयोग उत्तम प्रकार के साबुन और इत्र बनाने में प्रयोग किया जाता है, क्योकिं इसकी सुगंध बड़ी ही मनोरम होती है।

     

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