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    निजी अहंकार से ऊपर हों देश के मुद्दे

    Farmer Protest

    कल 29 दिसंबर को किसान-सरकार वार्ता के लिए किसानों ने अपना चार सूत्रीय एजेंडा तैयार कर लिया है। किसान चाहते हैं कि सरकार तीनों कृषि बिलों को खत्म करने वाली क्रियाविधि स्पष्ट करे, न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनन गारंटी दे, धान की पराली जलाए जाने पर लगने वाले जुर्माने को हटाए, भावी बिजली कानून के मसौदे में भी बदलाव करे, अब आगे सरकार की ओर से अभी जो होना है वह वार्ता की टेबल पर ही स्पष्ट होगा। उधर भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल गांधी पर जिस तरह से ‘ये क्या जादू है’ का सवाल उछाला है एवं इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में किसान आंदोलन पर एक भी शब्द नहीं कहना स्पष्ट करता है कि 29 दिसंबर को शायद ही किसान आंदोलन का मुद्दा हल हो। दिल्ली से प्रकाशित एक अखबार ‘सिख टाइम्स’ ने अपने सूत्रों के हवाले से एक रहस्योद्घाटन छापा है जिसमें अखबार ने कहा है कि भाजपा अंदर ही अंदर किसान आंदोलन को कुचलने की पूरी तैयारी कर रही है।

    सिख टाइम्स के अनुसार सरकार का खुफिया तंत्र भीड़ में बच्चों, बुजुर्गों व महिलाओं की संख्या व स्थिति का जायजा ले रहा है, किसी रोज रात को सोते आंदोलनकारियों पर कार्रवाई की जाएगी व आंदोलनकारी युवा खासकर पुरूष किसानों को अस्थायी जेल में भेजा जाएगा। सिख टाइम्स के रहस्योदघाटन अगर झूठे भी हैं, तब भी यह समझा जा सकता है कि सरकार मीडिया के माध्यम से आंदोलनकारी किसानों को भयभीत कर आंदोलन खत्म कराना चाहती है। किसान आंदोलन पर सरकार की जिद्द अब देश व मुद्दों से ऊपर उठकर निजी अहंकार का विषय बन चुकी लगती है। क्योंकि किसान संगठनों ने पहले ही वार्ताओं में सरकार जो आशंकाएं वर्तमान बिलों के विरुद्ध जताई हैं उनका सरकार के पास निर्णायक उत्तर नहीं है।

    उलटे सरकार किसान हित के विज्ञापनों से जिन किसानों को खुश दर्शा रही थी वही किसान धरनों में शामिल हैं। किसान संगठनों का शक अगर सच है कि बिलों के पीछे अंबानी-अडानी उद्योग जगत के लोग हैं तब भविष्य में भाजपा का जो राजनीतिक नुक्सान होगा उसकी भरपाई उद्योग जगत भी नहीं कर पाएगा। भाजपा अपने उस दौर में पहुंच चुकी है यहां आगे शिखर खत्म होकर ढ़लान शुरू हो रही है। भाजपा अगर शिखर पर टिके रहना पसंद करती है तब उसे शहरी वोटरों पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि वर्तमान कृषि बिलों से सबसे ज्यादा मार शहरी वर्ग को पड़ेगी, चूंकि कृषि बिलों से भविष्य में खाने का सामान कई गुणा महंगा होने वाला है। प्रधानमंत्री जी को सोचना होगा कि ‘प्रधान सेवक’ शब्दों से नहीं बना जा सकता उसके लिए जनता की सेवा में कोई गुस्ताखी न हो, इस पर भी गौर रखना होता है। केन्द्र सरकार को किसान मुद्दों का अविलम्ब हल निकालने की ओर बढ़ना चाहिए।

     

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