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Wednesday, April 1, 2026
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    पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज से सत्संग में पुछे गए रूहानी सवाल जावाब

    Shah Satnam Singh Ji Maharaj

    पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सन् 1960 से 1991 तक बहुत से सत्संग फरमाए और इस बीच सत्संगियों ने समय-समय पर पूजनीय परम पिता जी से अनेक प्रश्न पूछे। जो कुछ प्रश्न विभिन्न स्त्रोतों से हमें प्राप्त हुए, उन्हें आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं:-

    प्रश्न : दो प्रेमी आपस में मालिक की चर्चा करें, क्या वह समय सुमिरन में गिना जाता है?

    उत्तर : मालिक की चर्चा, नाम-चर्चा अथवा प्रभु-भक्ति की बात, जिसमें अपना कोई स्वार्थ न हो वह एक तरह का सुमिरन ही है क्योंकि जहां मालिक की चर्चा में इन्सान का दिन गुजरता है, वहीं रात्रि एकांत में जब मालिक की याद (सुमिरन) में बैठता है तोे बहुुत जल्दी ध्यान जमता है और रूह शरीर के नौ-द्वारों में से सिमटकर बहुत जल्दी एकाग्र होकर दसवें द्वार में पहुंचती है, जहां सतगुुरू-मालिक के दर्श-दीदार होते हैं।

    प्रश्न : मालिक के दर्श-दीदार के लिए कौनसा मार्ग सर्वश्रैष्ठ है?

    उत्तर : राम नाम का सुमिरन तथा अल्लाह-वाहेगुरू की भक्ति इबादत ही प्रभु दर्शन के लिए सर्वश्रैष्ठ मार्ग है। इसके अतिरिक्त सभी लोगों के लिए यह अति आवश्यक है कि खाना नाम जपकर, सुमिरन करते हुए बनाएं तथा साथ ही अरदास भी करें कि हे मालिक! जो भी इस खाने को खाए,उसे तेरी याद आए। यह वैज्ञानिक तथ्य भी है कि ‘‘जैसा खाए अन्न वैसा होए मन’’ ख्यालों से, विचारों से, चलते-फिरते तथा उठते-बैठते, मालिक के नाम का सुमिरन हमेशा करते रहें। अपने अंदर ही सच्ची तड़प बनाएं और घंटा सुबह तथा घंटा शाम एकान्त में बैठकर सुमिरन जरूर करें।

    प्रश्न : यदि कोई डेरा सच्चा सौदा से नाम प्राप्त करने के पश्चात किसी ऐसी संस्था से जुड़ जाता है जहां पाखंडवाद हो लेकिन सुमिरन इसी नाम का करता है तोे क्या नाम रस उसे बराबर मिलता रहेगा?

    उत्तर : मालिक के नाम का सच्चा रस व असल आनंद और सतगुरू की रहमत अपने अंदर की सच्ची तड़प व अपने सतगुरू के प्रति दृढ़ विश्वास से मिलता है। जब किसी प्रेमी का विश्वास डोल जाता है तो उसे असली खुशी नहीं मिलती। सतगुरू को नाम की लाज तो है लेकिन यह जरूरी नहीं कि सतगुरू उसे दर्शन दें। अत: सत्संगी को पाखंडवाद से दूर रहना चाहिए।

    प्रश्न : लेटकर सुमिरन करना व बैठकर सुमिरन करना दोनों में क्या अंतर है और फल किसका ज्यादा है?

    उत्तर : लेटकर सुमिरन करते समय मनुष्य को आलस्य आ जाने से जल्दी नींद आ जाती है तथा बैठकर सुमिरन करने से वह सचेत रहता है, जिससे ध्यान भी अच्छा लगता है। इसलिए बैठकर सुमिरन करने का फल ज्यादा है।

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