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Tuesday, March 31, 2026
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    नागरिकों की निजता की सुरक्षा सरकार का दायित्व

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    दो-तीन रोज पहले सुप्रीम कोर्ट ने पेगासेस स्पाइवेयर पर सरकार को काफी खरी-खोटी सुनाई, सरकार को साफ-साफ समझाया कि हर बात को देश की सुरक्षा की आड़ में सिद्ध करना ठीक नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तरफ से स्पाईवेयर की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी है। कमेटी जांच करेगी कि क्या पेगासेस सरकार की अनुमति से खरीदा गया? सरकार ने इसे किस सुरक्षा एजेंसी के माध्यम से प्रयोग किया व सुरक्षा एजेंसी को क्या आदेश थे? सरकार ने किन-किन लोगों की जासूसी की और क्या जासूसी में एकत्रित डाटा किसी तीसरे पक्ष को भी दिया? सरकार ने स्पाइवेयर को प्रयोग के लिए आईटी कानूनों के साथ-साथ आंतरिक सुरक्षा के अर्न्तगत किन कानूनों व धाराओं में अधिकार का प्रयोग किया? हालांकि केन्द्र सरकार पेगासेस पर अभी तक न्यायपालिका को स्पष्ट जवाब नहीं दे पाई है कि आखिर क्यों सरकार ने देशभर में पत्रकारों, उद्योगपतियों, नेताओं, सांसदों, विधायकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी की है। उधर इज्ररायल सरकार ने साफ शब्दों में कहा है कि पेगासेस सिर्फ सरकारों को बेचा जाता है।

    कोई व्यक्ति या गैर सरकारी संस्थाओं को यह नहीं दिया जाता। पेगासेस के प्रयोग से केंद्र सरकार ने निश्चित तौर पर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को आघात पहुंचाया है। अपने ही देश में अपने ही लोगों की जासूसी वह भी बिना किसी अपराध में सलिंप्ता के करना निजता का घोर उल्लंघन है, वह भी तब जब जासूसी के बाद किसी भी व्यक्ति को अभियुक्त नहीं बनाया गया हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर व्यक्ति के अपने-अपने विचार, मत व विश्वास है। हर व्यक्ति की अपनी कार्यशैली है, जिसे किसी एक व्यक्ति, दल या संगठन की विचारधारा पर परखा जाना निहायत ही गलत है। परन्तु पता नहीं क्यों सरकार में बैठे लोग हर उस नागरिक पर देशद्रोही का तमगा लगा रहे हैं जो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाता। देश में बहस, विचारों की अभिव्यक्ति, नागरिकों एवं संवैधानिक संस्थाओं की आजादी पर राष्टÑीय सुरक्षा के नाम पर सरकारी हमले बढ़ रहे हैं।

    यह बेहद अराजक रवैया है कि देश की सर्वोच्चय न्यायिक पीठ को भी नहीं सुना जा रहा, आखिर न्यायपालिका को स्वतंत्रता की दी गई संवैधानिक गारंटी के लिए खुद ही सक्रिय होना पड़ा है। देश में आर्थिक, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय, स्वास्थ्य, शिक्षा, विकास, आंतरिक व बाहय कूटनीतिक मसलों पर नागरिकों, राजनीतिक दलों, सामाजिक संस्थाओं के बीच मतभिन्नता रहना एक सामान्य मानवीय व्यवहार है, इसी मतभिन्नता से भौतिक व मानसिक विकास आगे बढ़ता है। इस मतभिन्नता को राष्टÑीय सुरक्षा के नाम पर दबाना दरअसल सरकार का आतंकी रूप है, ऐसे में तो सरकार स्वयं देशविरोधी कही जाएगी। सरकार महज एक लोकइच्छा है वह संपूर्ण राष्टÑ नहीं है और न ही वह संविधान या कानून से ऊपर है। सरकार भी विधि के शासन में ही है। अत: सरकार से जहां भी चूक हुई है, उसे सुधारा जाना चाहिए, सरकार में जिन्होंने चूक की है उन्हें दंडित किया जाना चाहिए क्योंकि एक लोकतांत्रिक, संप्रभु राष्टÑ में उसके हर नागरिक की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है जिसकी रक्षा करना सरकार का दायित्व है।

     

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