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    …जब प्यारे सतगुरू जी ने बुधरवाली आश्रम को दिया पहला स्थान

    एक बार डेरा सच्चा सौदा मौजपुर धाम, बुधरवाली में बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज के भंडारे पर पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने पूजनीय परम पिता जी के स्वागत के लिए बहुत ही अच्छी सजावट कर रखी थी। पूजनीय परम पिता जी को जिस रास्ते से जाना था, उसको झंडियों व तोरणद्वारों से सजा रखा था तथा पूजनीय परम पिता जी के चलने के लिए मिट्टी की एक सुंदर पटरी बनाकर उस पर लिपाई करके बहुत ही सुंदर ढंग से सजा रखी थी। पूजनीय परम पिता जी ऐसी सुंदर व्यवस्था देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए। पूजनीय परम पिता जी को पता था कि ऐसी सुंदर व्यवस्था पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के अतिरिक्त और कौन कर सकता है। पूजनीय परम पिता जी ने वचन फरमाए कि सेवा व्यवस्था और सजावट में बुधरवाली का पहला स्थान है। बुधरवाली के उपरांत पूजनीय परम पिता जी जब सरसा दरबार में आए तो सेवादारों ने विचार किया कि पूजनीय परम पिता जी ने बुधरवाली आश्रम को पहला स्थान दिया है।

    Param Pita Shah Satnam Singh ji Sachkahoon

    हम भी ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे हमारा भी पहला नंबर आ जाए। ऐसा विचार करके पूजनीय परम पिता जी के स्टेज की ओर जाने वाले रास्ते पर विशेष प्रकार की चद्दरें बिछा दीं जो बहुत कीमती तथा इतनी चिकनी थीं कि उन पर चलते समय पैर फिसलने का डर भी था। इसलिए पूज्य हजूर पिता जी ने उनको हटाने का सुझाव दिया कितुं पहला स्थान पाने के चाव में किसी ने भी उनकी बात नहीं मानी।

    पूजनीय परम पिता जी जब स्टेज की तरफ जाने लगे तो पूज्य हजूर पिता जी की तरफ संकेत देते हुए सरसा के सेवादारों को फरमाया, ‘‘तुम बुधरवाली वालों की नकल करते हो, तुमने इन चद्दरों के लिए कितने पैसे खर्च कर दिए जबकि बुधरवाली वालों ने ना ही तो इतना खर्चा किया तथा व्यवस्था भी पहले दर्जे की थी।’’ इस तरह पूजनीय परम पिता जी सदैव आप जी (पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां) को ही महत्व दिया करते थे। जो कि इसके हकदार भी थे।

    एक दिन की बात है जब पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां अपनी नई जीप को अपने परम प्यारे सोहणे सतगुरू जी की पावन दृष्टि डलवाने के लिए दरबार में लाए तो पूजनीय परम पिता जी ने जीप के चारों ओर चक्कर लगाकर पावन दृष्टि डालते हुए फरमाया, ‘‘यह गाड़ी तो आश्रम की ही है।’’ परंतु असल राज किसी भी सेवादार के सामने प्रकट नहीं होने दिया। समय आने पर पूजनीय परम पिता जी के वचन सार्थक सिद्ध हुए।

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