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Thursday, March 5, 2026
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    मेडिकल पर धड़ल्ले से बेच रहे नशीली गोलियां

    पुलिस प्रशासन बेबस: नशीली गोलियां एनडीपीएस एक्ट में नहीं आती

    • गोलियों को ब्लैक में खरीदकर ब्लैक में ही बेच रहे संचालक

    ओढां (सच कहूँ/राजू)। मेडिकल संचालक धड़ल्ले से नशीली गोलियां बेचकर मोटी कमाई कर रहे हैं, लेकिन पुलिस चाह कर भी कोई कार्रवाई नहीं कर पा रही। सुनने में भले ही कुछ अजीब लग रहा हो, लेकिन ये कटु सच्चाई है। अकेली पुलिस ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य विभाग भी इस मामले में बेबस नजर आ रहा है।

    यह भी पढ़ें:– नशीली गोलियां बेचने के आरोप में मेडिकल स्टोर मालिक गिरफ्तार

    सामने आया है कि जो गोलियां मेडिकल संचालक बेच रहे हैं उस पत्ते की कीमत करीब 65 रुपये के आसपास है। लेकिन नशे में प्रयुक्त होने के चलते मेडिकल संचालक उसी पत्ते के 250 से 300 रुपये तक कमा रहे हैं। ये गोलियां आजकल मेडिकलों पर आम बिक रही हैं। दरअसल मेडिकल संचालक टपेंटाडोल नामक गोलियां बेच रहे हैं। इन गोलियों को नशेड़ी नशे के रूप में प्रयुक्त करते हैं। इन गोलियों में खास बात ये है कि ये भले ही नशीली गोलियां हैं, लेकिन एनडीपीएस एक्ट में न आने के चलते मेडिकल संचालक बेखौफ होकर बिक्री कर रहे हैं।

    यदि पुलिस किसी नशेड़ी या मेडिकल संचालक को पकड़ भी लेती है तो उक्त गोलियों के एक्ट के तहत न आने के चलते मजबूरन उन्हें छोड़ना पड़ता है। हालांकि इसके लिए सैल-परचेज दोनों बिल होना अनिवार्य है, लेकिन मेडिकल संचालक इन गोलियों को ब्लैक में खरीदकर ब्लैक में ही बेच देते हैं। इसलिए न तो इनका कोई लेखा-जोखा है और न ही कोई पूछने वाला। ये गोलियां गांवों के लोकल मेडिकलों पर भी आम बिक रही है।

    रेड मारने से हाथ पीछे खींचती है पुलिस

    एक मेडिकल संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इसमें अच्छी कमाई है। ब्लैक में गोलियां आसानी से सस्ती मिल जाती है। एनडीपीएस में आती नहीं इसलिए पुलिस केस का कोई डर नहीं है। उसने दबी जुबान में ये भी माना कि यहां सेटिंग से सब-कुछ चलता है। वहीं पुलिस भी इस बात को लेकर रेड मारने से हाथ पीछे खींचती है कि ये गोलियां एनडीपीएस में तो आती नहीं। फिर मात्थापच्ची करने से क्या फायदा।

    सूत्रों के मुताबिक कुछ गांवों में तो किराने की दुकानों पर भी ये गोलियां बिक रही हैं। इस पूरे क्रम चक्र में मेडिकल संचालक तो मोटी कमाई कर ही हैं और युवा वर्ग नशे का शिकार हो रहा है। ये नशा अन्य नशों से सस्ता पड़ने के चलते युवा इसका तेजी से शिकार हो रहे हैं। यदि विभाग ने इस मामले में कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो समाज में इसके काफी विपरीत परिणाम सामने आएंगे।

    इस मामले मेंं विभाग कार्रवाई करता है। हम मेडिकलों पर औचक निरीक्षण करते रहते हैं। अगर कोई मेडिकल संचालक बिना बिल के दवाई बेचता पाया जाता है तो उसका पार्सल रद्द करने के बाद लाइसेंस भी रद्द कर दिया जाता है। इस मामले को लेकर विभाग का प्रोसेस चल रहा है।
                                                                                          – रजनीश धानीवाल, जिला ड्रग अधिकारी।

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