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    Brics Summit 2023: ब्रिक्स में संभावनाओं की नई विवेचना

    Brics Summit 2023
    ब्रिक्स में संभावनाओं की नई विवेचना

    Brics Summit 2023: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 22 से 24 अगस्त के बीच 15वें ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन किया गया। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये 5 ऐसे देशों का समूह है जो लगभग दुनिया की आधी आबादी से युक्त है और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं एशिया महाद्वीप समेत यूरेशिया को समेटे हुए है। सभी देशों के शीर्ष नेतृत्व की भागीदारी सम्मेलन में हमेशा रही है मगर इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चीन के राष्ट्रपति ने जहां इसमें शिरकत की वहीं रूस की ओर से विदेश मंत्री ने भागीदारी की। Brics Summit 2023

    जबकि भारत के प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति रही। हालांकि वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स के प्रभाव पर अपने विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि दुनिया भर में ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ रहा है। ब्रिक्स का तात्पर्य ब्राजील, रूस, चाइना, इण्डिया और दक्षिण अफ्रीका होता है। फिलहाल यूक्रेन युद्ध के बीच सम्पन्न ब्रिक्स सम्मेलन कई उलझे सवालों को शायद ही सुलझा पाया हो। मगर तमाम वैश्विक समूहों की तुलना में यह संगठन कई उतार-चढ़ाव के बावजूद अपनी प्रासंगिकता को बरकरार बनाये हुए है। तकनीकी पक्ष यह भी है कि चीन ब्रिक्स का सदस्य होने के नाते मंच भरपूर साझा करता है मगर डोकलाम विवाद, उत्तरी लद्दाख में घुसपैठ और भारत की सीमा पर समस्या खड़ा करने के साथ पाकिस्तानी आतंकियों का बड़ा समर्थक है, जो हर लिहाज से भारत के विरूद्ध है।

    रूस व पूर्व में सोवियत संघ भारत का नैसर्गिक मित्र है जो हर परिस्थितियों में चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की बात हो सदैव भारत का पक्षधर रहा है। ब्राजील के साथ भारत की जहां संतुलित दोस्ती है, वहीं दक्षिण अफ्रीका के साथ तो औपनिवेशिक सत्ता से अब तक नजदीकी का एहसास बना हुआ है। महात्मा गांधी का टॉलस्टॉय का जिक्र व भारत की विविधता की ताकत समेत कई ऐसे प्रभावशाली संदर्भ ब्रिक्स सम्मेलन में बेहतर चर्चा से भरे थे। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स की प्रासंगिकता और इसकी प्रगतिशीलता को काफी बेहतर करार देते हुए इसके विस्तार पर भी जोर दिया। एक रिपोर्ट से भी पता चलता है 40 से अधिक देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की रूचि व्यक्त की है। यदि ऐसा होता है तो इस समूह की वैश्विक स्थिति और सघन व प्रगाढ़ हो जायेगी। फलस्वरूप जी-7 जैसे देशों को कड़ी टक्कर भी मिलेगी।

    गौरतलब है कि 2016 में भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स को एक समूह के रूप में परिभाषित किया गया था जो उत्तरदायी, समावेशी और सामूहिक समाधान से युक्त है। अब इसे 7 साल और बीत गये है जाहिर है अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना, नवाचार को प्रेरित करना और बड़े अवसरों को बढ़ावा देना ब्रिक्स देशों की जिम्मेदारी होनी चाहिए। परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण यह भी है कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने चन्द्रयान-3 को सफलतापूर्वक चांद के दक्षिणी हिस्से पर उतारकर दुनिया में यह संदेश दे दिया कि वह ब्रिक्स में ही नहीं बल्कि संसार में उसकी ताकत तकनीकी तौर पर बेहतर हुई है और यह सब ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ही हुआ।

    प्रधानमंत्री मोदी ने 5 सूत्री प्रस्ताव रखते हुए भारत की ताकत को न केवल और बड़ा किया है बल्कि ब्रिक्स के तमाम सदस्यों के लिए भी एक सारगर्भित मापदण्ड को प्रारूपित किया है। मसलन अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग, स्किल मैपिंग, पारम्परिक चिकित्सा समेत विभिन्न पहलुओं को भी विमर्षीय बनाया। देखा जाये तो लगभग दो दशकों में ब्रिक्स ने एक लम्बी और शानदार यात्रा तय की है।

    गौरतलब है कि जब ब्रिक्स का पहली बार प्रयोग वर्ष 2001 में गोल्डमैन साक्स ने अपने वैश्विक आर्थिक पत्र द वर्ल्ड नीड्स बेटर इकोनोमिक ब्रिक्स में किया था जिसमें इकोनोमीट्रिक के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि आने वाले समय में ब्राजील, रूस, भारत एवं चीन की अर्थव्यवस्थाओं का व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूपों में विश्व के तमाम आर्थिक क्षेत्रों पर नियंत्रण होगा तब यह अनुमान नहीं रहा होगा कि आतंकवाद से पीड़ित भारत से मंचीय हिस्सेदारी रखने वाला चीन पाकिस्तान के आतंकियों का बड़ा समर्थक सिद्ध होगा। हालांकि चीन और भारत के बीच रस्साकशी वर्षों पुरानी है जबकि ब्रिक्स का एक अन्य सदस्य रूस भारत का दुर्लभ मित्र है। साफ है कि पांच देशों के इस संगठन में भी नरम-गरम का परिप्रेक्ष्य हमेशा से निहित रहा है।

    साल 2016 में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में सदस्य देशों ने जिस तर्ज पर बैठकों में आतंक के खिलाफ एक होने का निर्णय लिया उससे भी यह साफ था कि मंच चाहे जिस उद्देश्य के लिए बनाये गये हों पर प्राथमिकताओं की नई विवेचना समय के साथ होती रहेगी और यह आज भी मानो इसमें समाहित है। सितम्बर 2016 की उरी घटना के बाद भारत ने जिस विचारधारा के तहत पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकियों को सर्जिकल स्ट्राइक के तहत निशाना बनाया वह भी देश के लिए किसी नई अवधारणा से कम नहीं था।

    साथ ही पड़ोसी बांग्लादेश समेत विश्व के तमाम देशों ने भारत के इस कदम का समर्थन करके यह भी जता दिया कि आतंक से पीड़ित देश को जो बन पड़े उसे करना चाहिए। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ब्रिक्स के माध्यम से 2016 में गोवा में सभी सदस्यों समेत भारत और चीन का एक मंच पर होना और प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि आतंक के समर्थकों को दण्डित किया जाना चाहिए, में भी बड़ा संदेश छुपा हुआ था जाहिर है यह संदेश चीन के कानों तक भी पहुंचे थे।

    देखा जाए तो ब्रिक्स पांच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है जहां विश्व भर की 43 फीसदी आबादी रहती है और पूरे विश्व के जीडीपी का 30 फीसदी स्थान यही घेरता है। इतना ही नहीं वैश्विक पटल पर व्यापार के मामले में भी यह 20 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी रखता है। अब तक जोहान्सबर्ग सहित 15 ब्रिक्स सम्मेलन हो चुके हैं। इसका पहला सम्मेलन जून 2009 में रूस में आयोजित हुआ था। विवेचना और संदर्भ यह भी है कि क्या कोविड-19 के आर्थिक संकट से अभी भी देश बाहर नहीं निकल पाये हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती और चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। ब्रिक्स देशों के लिए नवीनता इस सुस्ती से निपटने का सबसे कारगर तरीका होगा जिसके लिए सदस्यों के बीच पारदर्शिता, सारगर्भिता और सच्ची आत्मीयता की तिकड़ी भी होनी चाहिए।

    दुनिया जानती है कि भारत को नीचा दिखाने के लिए चीन पाकिस्तान की हर गलतियों पर साथ देता है। फिर वह चाहे आतंक को ही बढ़ावा देने वाली क्यों न हो परन्तु चीन के लिए यह भी समझना ठीक रहेगा कि वह दुनिया के निशाने पर है और भारत दुनिया की निगाहों में बसता है। नीति एवं कूटनीति के तर्ज पर देखें तो भारत ब्रिक्स सम्मेलन में मन-माफिक सफलता हासिल कर ली है। जोहान्सबर्ग का ब्रिक्स सम्मेलन भारत के चन्द्रयान-3 की सफलता के साथ जोड़कर जरूर देखा जायेगा।

    सबके बावजूद सुविचारित और विवेचित दृष्टिकोण यह भी है कि दुनिया में भारत की बढ़ी साख का प्रभाव ब्रिक्स सम्मेलन में भी देखने को मिला। शायद यही कारण है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय नियमों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के आधार पर सभी देशों को संयुक्त रूप से लिखना चाहिए न कि किसी मजबूत देश के कहने पर। साथ ही यह भी चिंता कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए और विभाजनकारी नीतियों से दूर रहना चाहिए। फिलहाल यह सम्मेलन आगे आने वाले सम्मेलन तक विमर्श और विवेचना की अगुवाई करता रहेगा। Brics Summit 2023

    डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक
    (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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