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    Brihadeeswarar Temple: 1 हजार वर्ष से भी पुराना यह शिव मंदिर, बिना नींव के कई भूकंप झेल चुका है

    Brihadeeswarar Temple
    Brihadeeswarar Temple: 1 हजार वर्ष से भी पुराना यह शिव मंदिर, बिना नींव के कई भूकंप झेल चुका है

    तंजावुर। सावन का पावन महीना देशभर में श्रद्धा और आस्था का प्रतीक होता है। इस अवसर पर शिव मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि वास्तुकला की दृष्टि से भी यह एक चमत्कार माना जाता है। यह मंदिर चोल वंश की महानता और सांस्कृतिक समृद्धि का भव्य प्रतीक है। Brihadeeswarar Temple

    एक हजार वर्षों से अडिग – विश्व धरोहर में सम्मिलित

    बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल सम्राट राजराज प्रथम द्वारा 1004 ईस्वी में प्रारंभ कराया गया और यह 1010 ईस्वी तक पूर्ण हो गया। यह मंदिर द्रविड़ स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। 1987 में यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी गई थी। 200 फीट ऊँचे इस मंदिर के शिखर पर 80 टन वजनी ग्रेनाइट पत्थर स्थापित है, जिसे आज भी वैज्ञानिक दृष्टि से एक अद्भुत उपलब्धि माना जाता है।

    मंदिर का विमान (मुख्य शिखर) और गर्भगृह, दोनों द्रविड़ स्थापत्य कला के अनुरूप निर्मित हैं। इतनी ऊँचाई पर इतना भारी पत्थर कैसे पहुँचाया गया—यह आज भी शोध का विषय बना हुआ है। तंजावुर में ग्रेनाइट उपलब्ध नहीं था, इसलिए इस पत्थर को सैकड़ों किलोमीटर दूर की खदानों से लाकर मंदिर निर्माण में उपयोग किया गया।

    इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 3000 हाथियों, बैलों और मानव श्रमिकों की सहायता से यह कार्य संपन्न हुआ। मंदिर की दीवारों पर अंकित शिलालेख और भित्तिचित्र चोल कालीन जीवनशैली, नृत्य, संगीत, धार्मिक अनुष्ठानों और प्रशासन की जानकारी देते हैं।

    यह मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि अपने समय में एक सांस्कृतिक केंद्र भी था। यहाँ भरतनाट्यम, संगीत प्रस्तुतियाँ और धार्मिक आयोजनों का नियमित आयोजन होता था। मंदिर की रोशनी के लिए 160 से अधिक दीपक जलाए जाते थे, जिनके लिए 2832 गायों, 1644 भेड़ों और 30 भैंसों से घी की आपूर्ति की जाती थी।

    मंदिर का स्वरूप और संरचना

    बृहदेश्वर मंदिर परिसर में गर्भगृह, अर्धमंडप, महामंडप, मुखमंडप और नंदी मंडप सहित अन्य कई देवी-देवताओं के मंदिर भी हैं, जैसे गणेश, सुब्रह्मण्यम, नटराज आदि। मंदिर का प्रवेश द्वार (गोपुरम) और उसमें स्थित द्वारपाल मूर्तियाँ चोल काल की विशिष्ट कला को दर्शाती हैं। गर्भगृह दो मंजिला है, जिसमें विशाल शिवलिंग स्थापित है—यह शिवलिंग दो मंजिलों के बराबर ऊँचा है। चारों ओर बना परिक्रमा पथ श्रद्धालुओं को ध्यान और भक्ति में लीन होने का अवसर प्रदान करता है।