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Thursday, January 29, 2026
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    Nepal Gen-Z Protest News: नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया को क्यों किया बैन, हुआ बड़ा खुलासा, जानकर आप भी हो जाओगे हैरान

    Nepal Gen-Z Protest News:
    Nepal Gen-Z Protest News: नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया को क्यों किया बैन, हुआ बड़ा खुलासा, जानकर आप भी हो जाओगे हैरान

    Nepal Gen-Z Protest News:  डॉ. संदीप सिंहमार। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कथित भ्रष्टाचार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन के विरोध में हो रहे व्यापक और हिंसक प्रदर्शन के बीच इस्तीफा दे दिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि सरकार तानाशाही रवैये पर चल रही थी और लोकतंत्र को कमजोर कर रही थी। इस कारण से काठमांडू और अन्य क्षेत्रों में भारी प्रदर्शन और हिंसा हुई जिसमें करीब 20 युवकों की मौत भी हुई। इसके साथ ही चार मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया, जिससे गठबंधन सरकार संकट में आ गई है। अब सरकार के टूटने का खतरा बढ़ गया है और संसद भंग कर नए चुनाव कराने की मांग भी हो रही है। प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है लेकिन स्थिति काफी अस्थिर बनी हुई है और भविष्य में गठबंधन सरकार के टिकने पर अनिश्चितता है।

    इस्तीफे का कारण

    सोशल मीडिया बैन और प्रेस की आज़ादी पर लगी पाबंदी के विरुद्ध जनता व युवाओं का विरोध।
    कथित भ्रष्टाचार और तानाशाही के आरोप।
    बढ़ती हिंसा और प्रदर्शनकारियों की सड़कों पर आक्रामक मौजूदगी।
    मंत्रियों के भी इस्तीफे, जो सरकार की मजबूती को कमजोर कर गया।
    गठबंधन सरकार की स्थिति
    नेपाल में 2024 से शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस और केपी शर्मा ओली की CPN (UML) की गठबंधन सरकार थी।
    मंत्रियों के इस्तीफे और विरोध प्रदर्शन के कारण यह गठबंधन सरकार टूटने के खतरे में है।
    नेपाल राजनीतिक अस्थिरता के बीच नए चुनाव की ओर बढ़ सकता है।
    प्रधानमंत्री ने पहले सर्वदलीय बैठक बुलाई लेकिन वर्तमान माहौल और प्रदर्शन की तीव्रता को देखते हुए गठबंधन टिक पाने में कठिनाई दिखाई दी। इस प्रकार नेपाल में मौजूदा राजनीतिक संकट और बड़े विरोध प्रदर्शन के कारण प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है और शासन का भविष्य अस्थिरता के बीच है।

    शांतिप्रिय देश नेपाल में हिंसा दुर्भाग्यपूर्ण

    नेपाल उन विरले देशों में से है जिसकी ऐतिहासिक पहचान ही शांति और अध्यात्म से जुड़ी रही है। हिमालय की गोद में बसे इस राष्ट्र ने सदियों से संपूर्ण एशिया और विश्व के लिए आध्यात्मिक प्रेरणा दी है। सबसे बड़ा प्रमाण है लुंबिनी, जहाँ सिद्धार्थ गौतम ने जन्म लेकर बुद्ध के रूप में अहिंसा, करुणा और शांति का अमर संदेश दिया। यही कारण है कि नेपाल को केवल एक राजनीतिक भौगोलिक इकाई ही नहीं, बल्कि शांति का वैश्विक प्रतीक माना जाता है। पर नेपाल सरकार के सोशल मीडिया बैन करने के फैसले के खिलाफ हजारों की संख्या में युवा वर्ग ने सरकार का विद्रोह कर दिया। युवओं का तर्क है कि सरकार उनकी अभिव्यक्ति की आजादी छीन रही है। दूसरी तरफ नेपाल सरकार का तर्क है कि सोशल मीडिया कंपनीज ने उनके देश की सुरक्षा को दरकिनार किया है,तब उन्हें ऐसा कठोर निर्णय लेना पड़ा। नेपाल की राजधानी काठमांडू में युवावर्ग के आंदोलन के दौरान गोली लगने से कम से कम 20 युवाओं की मौत हो गई और सैंकड़ों आंदोलनकारियों को चोटें आई हैं। इसके बाद यह आंदोलन काठमांडू से बाहर निकलकर पोखरा तक फैल गया। स्थिति काबू से बाहर हुई तो युवावर्ग व अंतरराष्ट्रीय दबाव में सोशल मीडिया फिर भी शुरू की गई। पर आंदोलन अभी भी शांत नहीं हुआ है। नेपाल की पहचान वर्तमान में भी शांति के मार्ग पर चलने की रही है। ऐसे देश में हिंसा दुर्भाग्यपूर्ण है।

    नेपाल का इतिहास मुख्यतः सहिष्णुता और सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व का है। विभिन्न जातीय समूहों – गोरखा, नेवार, थारू, मगार, लिम्बू और अन्य समुदाय ने सदियों तक आपसी सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से इस समाज को बुना। हिन्दू और बौद्ध परंपराओं का मिलन नेपाल की आत्मा में गहराई तक बसा है, जहाँ पूजा-पाठ और पर्व-त्योहार साझा सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मनाए जाते रहे हैं। अपनी धार्मिक आस्था के लिए भारत सहित विभिन्न देशों के लोग नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर में बौद्ध मंदिर में जाते हैं। जहाँ जाने मात्र से ही मन को शांति मिलती है। फिर भी यह भूमि संघर्ष से अछूती नहीं रही। 18वीं शताब्दी में पृथ्वीनारायण शाह द्वारा नेपाल के एकीकरण के दौरान कई छोटे-छोटे राज्य और रियासतें अस्तित्वहीन हो गई। बाद के दौर में सत्ता संघर्ष और परिवर्तनशील राजनीतिक व्यवस्थाओं ने अस्थिरता को जन्म दिया। 20वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में राजशाही बनाम लोकतांत्रिक आंदोलन, और फिर 1996 से 2006 के बीच चला माओवादी जनयुद्ध नेपाल की सबसे गहरी हिंसात्मक स्मृति है।

    इस गृहयुद्ध ने दसियों हज़ार जीवन छीन लिए और लाखों लोगों को प्रभावित किया। पर लोकतंत्र बहाली के बाद नेपाल में हमेशा शांति ही रही है। माओवादी गृहयुद्ध के दौरान नेपाल ने शांति की कीमत समझी। उस काल की स्मृति आज भी ताज़ा है, जब समाज भय, विभाजन और अस्थिरता से जूझ रहा था। जिन्होंने देश की शांति और स्थिरता देखी थी, उन्होंने महसूस किया कि हिंसा विकास और प्रगति की राह को एक झटके में दशकों पीछे धकेल देती है। हिंसा का प्रभाव केवल आंतरिक राजनीति तक सीमित नहीं रहता। पर्यटन-प्रधान अर्थव्यवस्था पर इसका प्रत्यक्ष असर होता है। नेपाल के हिमालयी क्षेत्र, काठमांडू घाटी और ऐतिहासिक धरोहर स्थल विश्वभर के यात्रियों को आकर्षित करते हैं। लेकिन असुरक्षा और हिंसक गतिविधियों की खबरें इस सबसे संवेदनशील क्षेत्र को तुरंत प्रभावित कर देती हैं। यही कारण है कि आज भी नेपाल के नागरिकों और नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता शांति और स्थिरता बनाए रखना है।

    2006 में शांति समझौते और फिर 2008 में राजशाही से गणतंत्र की राह, नेपाल की ऐतिहासिक उपलब्धि रही। यह दर्शाता है कि विविध असहमतियों और संघर्षों के बावजूद संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही स्थायी समाधान दे सकती है। यही अनुभव नेपाल को भविष्य के लिए मार्गदर्शन देता है। यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया चाहे कितनी भी लंबी और चुनौतीपूर्ण रही हो, अंततः लोकतांत्रिक सहमति से आगे बढ़ी। यह इस बात का संकेत है कि जब भी नेपाल ने संवाद को अपनाया उसने अपने लिए स्थायित्व और सम्मानजनक रास्ता निकाला।

    वर्तमान संदर्भ और भविष्य की राह

    आज नेपाल संक्रमणकालीन चुनौतियों से गुजर रहा है-आर्थिक संसाधनों की कमी, नौजवानों का पलायन, और जलवायु परिवर्तन से उपजी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बना हुआ है। इन सबके बीच विकास की राह तभी प्रशस्त हो सकती है जब सामाजिक सौहार्द्र और राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित की जाए। यदि हिंसक घटनाएं पनपती हैं, तो वे न केवल मौजूदा समस्याओं को बढ़ाएँगी, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को भी बाधित करेंगी। देश का विकास भी रुकेगा। जिससे देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होगी।
    नेपाल को बुद्ध की करुणा और अशोक के अहिंसक दृष्टिकोण से प्रेरणा लेकर, संवाद और सहमति को प्राथमिकता बनाना होगा। समाज के सभी वर्ग – राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएँ, नागरिक समाज और आम जनता को मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि किसी भी असहमति को हिंसा का रूप नहीं दिया जाएगा।

    नेपाल की आत्मा उसकी शांति सहिष्णुता और भाईचारे में है। संघर्ष और हिंसा इसकी आत्मा को दुर्बल बनाते हैं। इतिहास यह साक्ष्य देता है कि जब-जब नेपाल ने हथियार की राह पकड़ी, तब-तब उसने अपनी स्थिरता खोई और जब-जब उसने संवाद और अहिंसा को अपनाया, तब-तब उसने अपनी वैश्विक पहचान को और मजबूती दी। आज समय की पुकार है कि नेपाल पुनः बुद्ध के संदेश को व्यवहार में उतारे और दुनिया के सामने अपने वास्तविक स्वरूप को प्रस्तुत करे। एक ऐसा राष्ट्र, जहाँ विविधता में एकता है, जहाँ असहमति का समाधान बातचीत से निकलता है, और जहाँ हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं।नेपाल तभी न केवल अपने नागरिकों के लिए शांति और समृद्धि सुनिश्चित करेगा, बल्कि विश्व को भी प्रेरित करेगा कि शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व ही वास्तविक विकास और प्रगति का मार्ग है।

    संवाद से समाधान संभव

    इतिहास गवाह है कि जब भी किसी शांतिप्रिय समाज में असहमति का स्वर हिंसा में बदलता है, तो यह समाज की आत्मा को गहरी चोट पहुँचाता है। दुर्भाग्य से नेपाल भी इससे अछूता नहीं रहा। अतीत में राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक विषमताओं से उपजे तनाव ने कभी-कभी इसे हिंसात्मक घटनाओं की ओर धकेला। ऐसी परिस्थितियाँ न केवल देश की शांति-छवि को धूमिल करती हैं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में भय और असुरक्षा का वातावरण भी पैदा करती हैं। हिंसा की सबसे बड़ी क्षति यही है कि यह विकास की गति को बाधित करती है। नेपाल का पर्यटन क्षेत्र, जो इसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, शांति और सुरक्षा पर ही निर्भर करता है। जब अशांति फैलती है, तो बाहर से आने वाले यात्री हिचकिचाते हैं, निवेशक पीछे हटते हैं, और सबसे अधिक प्रभावित आम नागरिक होते हैं। इस प्रकार एक पल का संघर्ष वर्षों की मेहनत और उपलब्धियों को कमजोर कर सकता है। नेपाल की ताकत उसकी सामुदायिक एकता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं में है। विभिन्न विचारों, मांगों और मतभेदों को अभिव्यक्त करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन यदि इसका तरीका हिंसा हो, तो यह उद्देश्य की पूर्ति के बजाय और अधिक विभाजन का कारण बनता है। संवाद और सहमति ही किसी भी असहमति का स्थायी समाधान दे सकते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि जब-जब नेपाल ने संवाद का मार्ग अपनाया, तब-तब शांति और प्रगति के नए रास्ते खुले हैं।

    अवसर और चुनौती के मुकाम पर नेपाल

    आज नेपाल उस मुकाम पर है, जहाँ उसके सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी। आर्थिक उन्नति, शिक्षा का विस्तार और नागरिक अधिकारों का सुदृढ़ीकरण इसकी नई दिशा हो सकती है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब हिंसा को पूरी तरह अस्वीकार कर संवाद और सहयोग को प्राथमिकता दी जाए। नेपाल को अपनी आध्यात्मिक धरोहर,बुद्ध का शांति संदेश,आधुनिक संदर्भ में याद करना होगा। यही वह आधारशिला है जिस पर एक स्थिर, समृद्ध और सशक्त नेपाल का निर्माण संभव है। इसलिए यह आवश्यक है कि नेपाल के सभी हितधारक नेतृत्व, राजनीतिक दल, सामाजिक संस्थाएँ और आम नागरिक मिलकर एक साझा संकल्प लें। हिंसा को त्यागें, संवाद को अपनाएँ, और सद्भाव को मजबूत करें। हिंसा नेपाल की आत्मा के विपरीत है, जबकि शांति उसकी असली पहचान है।यदि नेपाल अपने इस शांतिप्रिय मार्ग पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ता है, तो यह केवल अपने नागरिकों के जीवन में ही स्थायित्व और विकास नहीं लाएगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दुनिया को यह संदेश देगा कि असहमति का समाधान हथियारों से नहीं, बल्कि संवाद और सहयोग से ही संभव है।