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    Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग की संपत्ति पर नहीं मां-बाप का हक

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    Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नाबालिग की संपत्ति पर नहीं मां-बाप का हक

    Supreme Court: नई दिल्ली अनु सैनी। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की संपत्ति से जुड़े एक अहम मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर किसी नाबालिग की संपत्ति उसके माता-पिता या अभिभावक ने बिना कोर्ट की अनुमति के बेच दी है, तो वह व्यक्ति 18 साल का होने पर उस सौदे को बिना मुकदमा दायर किए भी रद्द कर सकता है। यह फैसला नाबालिगों के संपत्ति अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

    मामला क्या था | Supreme Court

    यह मामला कर्नाटक के दावणगेरे जिले के शमनूर गांव से जुड़ा था। 1971 में रुद्रप्पा नामक व्यक्ति ने अपने तीन नाबालिग बेटों के नाम पर दो प्लॉट (नंबर 56 और 57) खरीदे थे। कुछ वर्षों बाद उन्होंने कोर्ट की अनुमति लिए बिना ही वे प्लॉट तीसरे पक्ष को बेच दिए। जब बेटे बालिग हुए, तो उन्होंने वही प्लॉट दोबारा खुद बेच दिए, जिससे यह साफ हो गया कि वे अपने पिता द्वारा की गई बिक्री को मान्यता नहीं देते।

    निचली अदालतों के फैसले

    इस विवाद पर जब मामला अदालत में पहुंचा तो ट्रायल कोर्ट ने नाबालिगों (अब बालिग बेटों) के पक्ष में फैसला सुनाया। लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया और कहा कि चूंकि बेटों ने मुकदमा दायर नहीं किया, इसलिए उनके पिता द्वारा की गई बिक्री सही मानी जाएगी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने हाई कोर्ट का निर्णय रद्द करते हुए फिर से नाबालिगों के पक्ष में फैसला सुनाया।

    सुप्रीम कोर्ट की बेंच और निर्णय

    यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने 7 अक्टूबर 2025 को सुनाया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि:-
    “अगर कोई नाबालिग व्यक्ति बालिग होने के बाद अपने साफ और स्पष्ट व्यवहार से यह दिखाता है कि वह अपने गार्जियन द्वारा की गई बिक्री को स्वीकार नहीं करता, तो यह उस बिक्री को रद्द करने के लिए पर्याप्त है।” इसका मतलब यह हुआ कि मुकदमा दायर करना जरूरी नहीं, बल्कि स्पष्ट व्यवहार या कार्रवाई ही पर्याप्त है।

    कानून की धाराएं: धारा 7 और 8 का उल्लेख

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 7 और 8 का जिक्र किया।

    इन धाराओं के अनुसार:-

    किसी नाबालिग की संपत्ति को बेचने, गिरवी रखने या ट्रांसफर करने से पहले कोर्ट की अनुमति लेना आवश्यक है। अगर बिना अनुमति ऐसा सौदा किया जाता है, तो वह वैधानिक रूप से रद्द करने योग्य (Voidable) माना जाएगा। इसलिए, अभिभावक केवल संरक्षक की भूमिका निभा सकते हैं, मालिक की नहीं।

    कदमा दायर करना जरूरी क्यों नहीं

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो नाबालिग को बालिग होने के बाद मुकदमा दायर करने के लिए बाध्य करे।

    कोर्ट ने दो मुख्य कारण दिए:-

    1. जानकारी का अभाव: अक्सर नाबालिगों को यह पता ही नहीं होता कि उनकी संपत्ति बेची गई है। ऐसे में मुकदमा करना व्यावहारिक नहीं होता।
    2. संपत्ति का कब्जा: कई बार संपत्ति अब भी नाबालिग के पास ही रहती है, इसलिए मुकदमे की आवश्यकता नहीं होती।
    अगर बालिग होकर व्यक्ति स्वयं संपत्ति बेचता है या ट्रांसफर करता है, तो यह उसके पहले वाले सौदे को रद्द करने का स्पष्ट संकेत होता है।

    प्रमुख केस: के एस शिवप्पा बनाम श्रीमती के नीलमम्मा

    यह फैसला के एस शिवप्पा बनाम श्रीमती के नीलमम्मा केस में दिया गया। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि:-
    “अगर नाबालिग की संपत्ति को कोर्ट की अनुमति के बिना बेचा गया है, तो बालिग होने पर वह व्यक्ति अपने व्यवहार या कार्रवाई से ही उस बिक्री को अस्वीकार कर सकता है।” यह फैसला भविष्य में आने वाले ऐसे तमाम मामलों के लिए कानूनी मिसाल (Precedent) बन गया है।

    फैसले का प्रभाव और महत्व

    इस निर्णय से अब देशभर में उन हजारों मामलों पर असर पड़ेगा, जिनमें नाबालिगों की संपत्ति बिना कोर्ट की अनुमति के बेची गई है। अब ऐसे व्यक्ति बालिग होने पर या तो मुकदमा दायर करके, या फिर अपने व्यवहार से, उस बिक्री को रद्द कर सकेंगे। यह फैसला न केवल संपत्ति अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि गार्जियन अपनी स्थिति का दुरुपयोग न करें।

    फैसले के पीछे की सोच

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्याय की व्यावहारिकता और निष्पक्षता पर आधारित है। अदालत ने माना कि हर व्यक्ति को अपनी संपत्ति के अधिकार की रक्षा का अवसर मिलना चाहिए। कई बार अभिभावक बच्चों की संपत्ति को अपनी समझ से बेच देते हैं, लेकिन यह फैसला बताता है कि ऐसा करना कानूनी रूप से मान्य नहीं है। यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि गार्जियनशिप का अर्थ जिम्मेदारी है, अधिकार नहीं।

    नाबालिगों के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में कदम

    सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नाबालिगों के अधिकारों की रक्षा में एक मील का पत्थर साबित हुआ है। अब कोई भी गार्जियन बिना अदालत की अनुमति के नाबालिग की संपत्ति नहीं बेच सकता, और अगर ऐसा होता है, तो बालिग होने पर वह व्यक्ति बिना मुकदमा किए भी उस बिक्री को रद्द कर सकता है। यह निर्णय समाज में यह संदेश देता है कि बच्चों की संपत्ति पर अभिभावकों का हक नहीं, बल्कि संरक्षण की जिम्मेदारी है।