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    मासूम के जीवन से समझौता नहीं, घुट्टी के स्थान पर माँ का दूध सबसे जरूरी: डॉ अभिनव तोमर

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    Baraut News: मासूम के जीवन से समझौता नहीं, घुट्टी के स्थान पर माँ का दूध सबसे जरूरी: डॉ अभिनव तोमर

    बड़ौत (सच कहूँ/डॉ संदीप कुमार)। Baraut News: ग्रामीण क्षेत्रों में नवजात शिशु के जन्म के साथ ही घुट्टी चटाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। दादी–नानी का मानना है कि घुट्टी देने से बच्चा मजबूत बनता है और उसकी पाचन शक्ति बेहतर होती है। लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की गाइडलाइंस इस परंपरा को लेकर गंभीर चेतावनी देती हैं। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ अभिनव तोमर ने बताया कि घुट्टी एक घरेलू मिश्रण होती है, जिसमें औषधीय तत्वों के साथ शहद और विभिन्न मसाले मिलाए जाते हैं।

    आजकल यह घुट्टी बाजार में तैयार रूप में भी उपलब्ध है। हालांकि WHO और मेडिकल गाइडलाइंस स्पष्ट रूप से कहती हैं कि जन्म से छह महीने तक शिशु को मां के दूध के अलावा कुछ भी नहीं दिया जाना चाहिए, जिसमें घुट्टी भी शामिल है। डॉ अभिनव तोमर के अनुसार, घुट्टी देने से नवजात शिशुओं में कई तरह के संक्रमण देखने को मिले हैं। विशेष रूप से घुट्टी में मौजूद शहद से बोटुलिज़्म जैसी खतरनाक बीमारी का खतरा रहता है, जो शिशु के लिए जानलेवा भी हो सकती है। इसके अलावा घुट्टी से एलर्जी, उल्टी, दस्त और पेट से जुड़े संक्रमण की आशंका बढ़ जाती है। यह समस्याएं जन्म से छह माह तक के बच्चों में अधिक देखी जाती हैं, क्योंकि इस उम्र में उनका इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता।

    उन्होंने स्पष्ट किया कि WHO के अनुसार छह महीने बाद भी घुट्टी देना आवश्यक नहीं है। हालांकि यदि परिवार की परंपरा के चलते घुट्टी दी ही जाए, तो कुछ सावधानियां बेहद जरूरी हैं। घुट्टी घर पर स्वच्छ तरीके से तैयार होनी चाहिए, शहद की मात्रा बहुत कम रखी जाए ताकि बोटुलिज़्म का जोखिम घटे, और अधिक मसालों का प्रयोग बिल्कुल न किया जाए। डॉ तोमर ने बाजार में मिलने वाली घुट्टी को पूरी तरह असुरक्षित बताते हुए कहा कि इनमें मौजूद केमिकल्स और प्रिज़रवेटिव्स बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। Baraut News

    डॉ अभिनव तोमर ने कहा कि दादी–नानी का प्यार और अनुभव अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन नवजात शिशु की सुरक्षा के लिए विज्ञान और चिकित्सकीय तथ्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। सही जानकारी और सावधानी अपनाकर ही बच्चों को बीमारियों और संक्रमण से सुरक्षित रखा जा सकता है।उन्होंने कहा कि परंपराओं का सम्मान करते हुए भी नवजात के स्वास्थ्य के मामले में आधुनिक चिकित्सा मार्गदर्शन को प्राथमिकता देना समय की आवश्यकता है।

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