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    मेहर सिंह की शहादत पर फ़क्र, मगर भविष्य की फिक्र

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    धर्मपत्नी प्रतीम कौर ने दु:ख तकलीफों के बीच की बेटे व बेटी की परवरिश

    • 1988 में कारगिल में शहीद हुए मेहर सिंह के परिवार की किसी ने नहीं ली सुध
    • मंरणोपरान्त शहीद के परिवार को 1990 में राष्ट्रपति द्वारा दिया गया शोर्य चक्र

    टोहाना (सुरेन्द्र समैण)। शहीद देश का मान होते हैं उनकी बदौलत राष्ट्र चेन की नींद सोता है, शहीद अपनी अपने परिवार की चिंता किए बैगर एक क्षण में अपना जीवन देश के करोड़ों लोगों पर न्यौछावर कर देते हैं। जहां हम एक छोटी से चोट लगने पर बिलबिला जाते हैं वही वो देश की सीमा पर अपनी सीना छननी करवा कर भी हंसते हुए शहीद हो जाते हैं।

    उनकी शहादत को अनदेखा करने से बड़ा अपराध शायद ही कोई और हो। ऐसा ही कुछ टोहाना खंड के गांव सनियाना के कारगिल शहीद मेहर सिंह के साथ हो रहा है। फतेहाबाद के गांव सनियाना से मेहर सिंह 18 सितंबर 1988 को कारगिल की लड़ाई में शहीद हो गए थे। एक लंबी लड़ाई के बाद गांव के लोगों ने उनका नाम स्कूल व चौक के लिए कागजों में तो मंजूर करवा दिया पर चौक का नाम अभी भी धरातल में रखवाने में वो सफल नहीं हो पाए हंै।

    परिवार को फौज के अधिकारियों ने तो संभाला पर प्रदेश व देश का शासन प्रशासन से कभी भी उनकी सुध लेने उनकी चौखट पर नहीं पहुंचा। परिवार के आरोप बेहद गंभीर है कि उनकी प्राथमिकता होते हैं शहीद आवंबटन में भेदभाव हुआ। शहीद की शहादत के बेहद तकलीफे उठा कर उनकी धर्मपत्नी ने अपने बेटे व बेटी की परवरिश की। शहीद परिवार का कहना है कि हमें कुछ नहीं चाहिए पर जो एक शहीद का हक है वो तो उसे देने में राजनीति ना की जाए।

    आज तक दु:ख बांटने नहीं आया कोई अफसर

    शहीद की धर्मपत्नी प्रतीम कौर ने बताया कि उनकी शहादत पर बड़ी ही खुशी बड़ा ही मान है। बड़ा गर्व है उन्होंने जो देश के लिए किया है। लेकिन प्रशासन ने हमारे बारे में कु छ नहीं सोचा जो एक शहीद परिवार के लिए जरूरी था। जितनी बार भी हमने कोशिश की हमें कोई सफ लता नहीं मिली। मैंने आर्थिक तंगी के बीज अपने बच्चों का पालन-पोषण किया लेकिन किसी ने उनकी सहायता के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।

    सम्मान और परिवार को अनदेखा कर रही सरकार

    शहीद भगत सिंह युवा क्लब के प्रवक्ता जोगा सिंह ने कहा कि बडे दुभागर््य की बात है कि हम 2017 के आधुनिक भारत की बात करते हंै जिसमें इस शहीद की शहादत को सम्मान दिलवाने के लिए 25 से 30 साल लग गए। लेकिन वो सम्मान अब तक भी नहीं मिल पाया।बड़ी मुश्किलों के बाद कारगिल शहीद मेहर सिंह के नाम स्कूल का नाम रखवा पाए। जिसमें भी हमें 25 साल लग गए।

    शहादत से कारगिल में मिल रहा पीने का पानी

    शहीद के बेटे ने बताया कि कारगिल सेक्टर में पानी की समस्या थी जब ये लोग पानी के लिए बाहर निकलते थे तो पाकिस्तान की फौज भारत के लोगों को काफी नुकसान पहुंचाती थी तब उस समय 15 पंजाब रेजिमेंट जिसमें मेरे पिता जी भी शामिल थे। उन्होंने इस बात का बीड़ा उठाया था कि इस मुश्किल को हल किया जाएगा।

    तो इस तरह से सीनयिर अफसर से बात कर यह लड़ाई का रूप बना तो ओपी रक्षक शुरू हुआ है। पानी की लड़ाई बढ़ते-बढ़ते इतना बढ़ गई कि यह एक बडे आॅपरेशन का रूप ले गई। पानी की जो दिक्कत थी उसे तो आर्मी वालों ने क्लीयर कर दिया।

    लोगों को उस समय से लेकर आज तक पानी उपलब्ध हो रहा है। ये जो जगह है पानी वाली इसका नाम पापा पोस्ट है। आॅपरेशन रक्षक के दौरान ही मेरे पिता शहीद हुए थे। शहादत के बाद पापा पोस्ट को जितने के बाद देश के राष्ट्रपति ने उनको मरणोपांत शोर्य पदम 15 जनवरी 1990 को दिया था।

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