Param Pita Shah Satnam Ji: यह घटना दिसंबर माह, सन् 1953 की है। एक दिन पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज (गुरुगद्दी से पहले) अपने एक रिश्तेदार सरदार करतार सिंह जी से मिलने उनके गांव गदराना गए हुए थे। उन दिनों पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज भी गांव गदराना में ही स. नाहर सिंह जी के घर ठहरे हुए थे। पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज ने आठ दिन गदराना में रहकर सत्संग फरमाया। एक दिन गांव में भ्रमण करते हुए वे उस स्थान पर पहुंचे, जहाँ मिट्टी पर एक बड़े आकार का पैर का निशान (पदचिह्न) बना हुआ था। उस समय साईं जी के साथ कई सत्संगी भी उपस्थित थे। MSG Maha Rahmokaram Month
उस बड़े पदचिह्न को देखकर पूजनीय बेपरवाह साईं जी अचानक रुक गए। आप जी ने अपनी लाठी से उस निशान के चारों ओर गोल घेरा बना दिया और साध-संगत को संबोधित करते हुए जोश में फरमाया, ‘देखो भाई! यह रब की पैड़ है, यहाँ से स्वयं ईश्वर गुजरा है।’जब पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज साध-संगत का ध्यान उस पदचिह्न की ओर आकर्षित करते हुए फरमा रहे थे, तभी सरदार करतार सिंह भी वहाँ पहुंच गए।
उन्होंने बताया, ‘‘बाबा जी! यह तो हमारे रिश्तेदार श्री जलालआणा साहिब वाले सरदार हरबंस सिंह जी (जो पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का पहला नाम था) के पैरों के निशान हैं। जिन्हें मैं अभी-अभी विदा करके आया हूँ। हम दोनों पैदल इसी रास्ते से होकर गए हैं।’’ इस पर पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज ने अपने वचनों पर पुन: जोर देते हुए फरमाया, ‘‘इस मस्ताना सेवाधारी को नहीं मालूम कौन किसका रिश्तेदार है, पर यह जरूर ही ईश्वर के चरणों के निशान हैं।’’ MSG Maha Rahmokaram Month















