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    विधायकों को गफ्फे, किसानों को धक्के

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    दिल्ली में धरने पर बैठे किसानों की आवाज को अनसुना करते हुए तमिलनाडु सरकार ने अपने विधायकों के वेतन में दोगुना विस्तार किया है। नि:संदेह तमिलनाडु का कृषि संकट भी देश के अन्य हिस्सों की तरह समस्याओं से जूझ रहा है।

    इसी सरकार ने किसानों का एक लाख रुपए कर्ज माफ करने का फैसला लिया है। लोगों के चुने हुए प्रतिनिधि लोगों के सेवक होते हैं, जिन्होंने राज्य की बेहतरी में अपना योगदान देना होता है लेकिन पिछले 5-7 सालों में सांसदों व विधायकों का ध्यान सेवा की तरफ कम और वेतन भत्तों की तरफ ज्यादा रहा है।

    एक जमाना था, जब गांधी जी व शास्त्री जी जैसे नेता होते थे, जो देश की खातिर व्रत रखकर अन्न बचाते थे। सांसदों/विधायक की 50 हजार रुपए वेतन कोई कम नहीं। वेतन के अलावा उन्हें भत्ते भी मिलते हैं। वेतन से दोगुने-तिगुने हैं।

    वेतन बढ़ाने का सिलसिला एक राज्य से शुरू होता है, फिर दूसरों राज्य भी ये मांग उठाने लगते हैं। दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने तो कमाल ही कर दिया था। उन्होंने अपने विधायकों के वेतन लगभग 4 गुना करते हुए 2.10 लाख रुपए प्रति माह का बिल पास कर दिया।

    यह तो केंद्र सरकार ने ही बिल को खारिज कर दिया नहीं तो दिल्ली के विधायकों की बराबरी के लिए भी मांग उठनी लाजिमी थी। दरअसल राजनीति की परिभाषा ही बदल गई है। राज चलाने की अपेक्षा यह राज भोगने की नीति बन गई है।

    मोटा वेतन, नौकर, निजी सहायक, गाड़ी, गनमैन, चालक इत्यादि सुविधाएं विधायकों को काम करने के लिए मुहैया करवाई जाती हैं। सांसदों व विधायकों को खाना भी मामूली रेट पर उपलब्ध होता है। इसके बावजूद वेतन में विस्तार के लिए विधायकों की व्याकलुता उनकी धन लोलुपता को दर्शाता है।

    विधायक देश सेवा को प्राथमिकता दें व देश के लिए त्याग की भावना से काम करें ताकि राज्य के खजाने पर अनावश्यक बोझ न पड़े। हालांकि अभी भी कुछ ऐसे विधायक या मुख्यमंत्री भी हैं, जो अपना वेतन भी लोगों की भलाई में लगा देते हैं, लेकिन इनकी संख्या काफी कम है।

    विधायक के पांच साल सेवा के होने चाहिए न कि मजे लेने के। कृषि और व्यापार में आई गिरावट चिंता का विषय है। विधायक किसानों को जागरूक करने के साथ-साथ किसानों की आर्थिक सहायता करने की मिसाल बनें तो देश तरक्की कर सकता है। यही नहीं विधायक अपने अनावश्यक खर्चों को घटाकर देश का पैसा संयम से खर्च करें।

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