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    खूनी खेल ‘ब्लू व्हेल’ की गिरफ्त में भारत का भविष्य

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    हम आजतक सुनते आये हैं कि खेलों से स्वस्थ मनोरंजन व शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है। वस्तुत: खेल खेलने से मन:स्थिति में सकारात्मक सुधार, उत्साह का प्रफुस्टन एवं परस्पर भाईचारा और प्रेम के घनत्व में वृद्धि होती है, लेकिन, आधुनिक तकनीकी दौर में कम होते मैदानों के साथ मैदान में खेले जाने वाले वे खेल जो शारीरिक व्यायाम के साथ मानसिक एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाते थे, उनका बीते दो दशक से महत्व कम होता जा रहा है। इसका एक कारण इंटरनेट के गेम्स का बढ़ता दायरा भी है।

    इंटरनेट पर नाना प्रकार के गेम्स ने बाल एवं किशोर पीढ़ी को मैदानों के खेलों से अलगावित करने का प्रयास किया है। आज घंटों-घंटों तक एक बच्चा लेपटॉप, कम्प्यूटर व स्मार्ट फोन में इंटरनेट से डाउनलोड किये गये गेम्स खेलने में इतना मशगूल रहता है कि उसे खाने-पीने का ख्याल तक नहीं रहता। यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज इंटरनेट के इन आकर्षक और रोचक गेम्स ने बड़े-बुजुर्गों का भी काफी हद तक ध्यान आकर्षित किया।

    बेशक, इंटरनेट के बढ़ते उपयोग व तकनीकी विकास क्रम में उन्नति के साथ ऐसा होना कोई नई बात नहीं है और बच्चे इंटरनेट पर गेम्स खेलें, इससे किसी को कोई गुरेज भी नहीं है, लेकिन कोई गेम्स बाल व किशोर पीढ़ी के जान पर बन आये, तो यह निश्चित ही सोचने पर मजबूर कर देता है।

    भारत में बीते सोमवार की सुबह मुंबई में एक दु:खद वाक्या सामने आया, जहां 14 वर्षीय मनप्रीत ने इस गेम की लत में आत्महत्या कर ली। यह गेम ज्यादातर अवसाद से अकेले जूझ रहे बच्चों का निशाना बना रहा है।

    सोशल मीडिया ऐसी जगह है, जहां हर प्रकार के विचारों का पालन-पोषण किया जाता है। यहां जितनी सकारात्मकता होती है, उससे कहीं ज्यादा नकारात्मकता पायी जाती है। अच्छी बातें हमें इतनी जल्दी आकर्षित नहीं करती, जबकि नकारात्मक बातों का प्रभाव बहुत जल्दी फैलता है। चाहे वो घृणा फैलाते लेख हों, पोर्न साइट्स की उपलब्धता हो, नशे को महिमामण्डित कर किया जाने वाला प्रचार हो या और कुछ हो। जब भी ऐसा कुछ कहीं लिखा जाता है, सबसे ज्यादा इससे प्रभावित होने वाला तबका किशोरावस्था में प्रवेश करते बच्चों का होता है।

    इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर रूस में एक मनोविज्ञान के छात्र ने 2013 में एक अनलाइन गेम बनाया ‘ब्लू व्हेल’। यह गेम 50 दिनों की अवधि में पूरा किया जाता है। इसमें प्रतिदिन तरह-तरह की चुनौतियां खिलाड़ी को दी जाती हैं, जिन्हें पूरा करने के बाद प्रमाण स्वरूप उस चुनौती का वीडियो या फोटो ग्रुप में भेजा जाता है। हर चुनौती के पूरा होने पर हाथ पर एक कट लगाना होता है,

    जो 50 दिन पूरे होने पर व्हेल की आकृति बनाते हैं। इस खेल की आखिरी चुनौती आत्महत्या है। यह गेम बच्चों तक सोशल मीडिया पर चल रहे कुछ ग्रुप्स के द्वारा पहुंचता है। दुनियाभर में अब तक 200-300 बच्चे इस गेम की वजह से आत्महत्या कर चुके हैं। रूस, अमेरिका जैसे देशों में इसे बैन कर दिया गया है।

    सामान्यत: किशोरावस्था में दिमाग और शरीर विभिन्न प्रकार के परिवर्तनों से जूझ रहा होता है, हार्मोनल बदलाव हो रहे होते हैं, पढ़ाई-लिखाई का दबाव चरम पर होता है, ऐसे में सही दिशा-निर्देश न मिले, तो भटकाव हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। इस समय दिमाग इतना परिपक्व नहीं होता कि अपना भला-बुरा निर्धारित कर सके, किन्तु बड़े होने का बोध खुद को सही प्रमाणित करने पर तुला रहता है।

    इससे बचने का सिर्फ और सिर्फ एक ही तरीका है, अभिभावकों का बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार और आपसी संवाद करे ताकि बच्चे किसी भी प्रकार की बात घर पर बताते वक्त हिचके नहीं। बच्चों के व्यवहार में किसी भी प्रकार का बदलाव होने पर उसे अनदेखा न करें। उनमें इतना विश्वास भरें कि उन्हें आसानी से गुमराह न किया जा सके। अंतत: इस दिशा में सरकार को त्वरित कदम उठाने की जरूरत है।

    -देवेन्द्रराज सुथार

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