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    पेड़ों को बचाने में दिल्ली का उदाहरण

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    इंफा। ज ब पानी सर से ऊपर निकलने लग जाता है तो दिल्ली की जनता लोक हित के मुद्दों पर एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन करने लग जाती है। वर्ष 2011 में मनमोहन सिंह सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण दिल्ली ने गांधीवादी अन्ना हजारे का साथ दिया जो वर्षों तक स्थानीय भ्रष्टाचार के विरुद्ध महाराष्ट्र में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और वे दिल्ली आए तो उन्हें दिल्ली की जनता का भरपूर समर्थन मिला। उन्होंने दिल्ली में अन्ना आंदोलन किया। वे यहां आमरण-अनशन पर भी बैठे। उन्हें दिल्ली की जनता का भरपूर समर्थन मिला जिसके चलते सरकार को उन्हें यह आश्वासन देने के लिए बाध्य होना पड़ा कि लोकपाल की स्थापना के लिए शीघ्र कानून बनाया जाएगा। किंतु आज भी लोकपाल की स्थापना नहीं हो पायी है और उस आंदोलन से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ जिसकी दिल्ली में सरकार है।

    वर्ष 2012 में जब फिजियोथेरेपी की छात्रा निर्भया के साथ एक बस के कर्मचारियों ने जघन्य दुष्कर्म किया तो दिल्ली की जनता महिला सुरक्षा के लिए एक बार फिर एकजुट हुई और इसके चलते सरकार को दुष्कर्म के विरुद्ध कठोर कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस कानून से दुष्कर्म की घटनाओं में कमी नहीं हुई हो किंतु नागरिक समाज के एकजुट होने से संपूर्ण देश में प्रशासन महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामले में संवेदनशील बना और जनता के दबाव के बाद निर्भया मामले में दोषियों को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गयी। अब पुन: दिल्ली की जनता के हित खतरे में हैं क्योंकि दक्षिण दिल्ली की कुछ कालोनी सरोजनी नगर, नेताजी नगर और नौरोजी नगर के तथाकथित पुनर्विकास के नाम पर 14 हजार पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है। किंतु दिल्ली की जनता ने एकजुट होकर इसका भी विरोध किया। दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण और तापमान के चलते यह विरोध प्रदर्शन इतना भारी था कि सरकार को अपने प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा। न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी। आवास और शहरी विकास मंत्री ने आदेश दिया कि किसी भी पेड़ की कटाई नहीं होगी और इन कालोनियों के पुनर्विकास की योजना इस तरह बनाने के लिए कहा गया कि पेड़ों की कटाई न हो। जब नागरिक समाज एकजुट होता है तो वह शक्तिशाली बन जाता है।

    हैरानी इस बात पर होती है कि योजनाकार यह कैसे भूल गए कि दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बहुत ऊंचा है और उन्होंने 14 हजार पेड़ों की कटाई का सुझाव दे दिया। उसके बाद दिल्ली के वन विभाग ने इन पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी। प्राप्त रिपोर्टो के अनुसार पिछले सात वर्षों में दिल्ली के वन विभाग ने 44 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई की अनुमति दी और अब फिर इसने 14 हजार पेड़ों की कटाई की अनुमति दे दी थी। वन विभाग के कर्मचारियों का लगता है कि विवेक खो गया है। वन विभाग ने दिल्ली के नागरिकों के स्वास्थ्य और कल्याण तथा दिल्ली के वातवरण के प्रति उदासीनता दर्शायी। यदि वन विभाग को इसी तरह कार्य करने दिया जाए तो वे निकट भविष्य में दिल्ली को रेगिस्तान बना देंगे।

    दिल्ली में पहले ही प्रदूषण का स्तर बहुत ऊंचा है और यहां पर प्रदूषण का स्तर पीएम 10 है जबकि पीएम 2.5 से अधिक हो सामान्य से अधिक माना जाता है और इतने बडेÞ पैमाने पर पेड़ों की कटाई से प्रदूषण का बढ़ना लाजिमी है। दिल्ली के नागरिक पहले ही इस प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं और यदि इतने पेड़ों की कटाई की गयी तो उनके समक्ष स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं पैदा हो जाएंगी। ऐसा लगता है कि न तो सरकारी पर्यावरण संरक्षण एजेंसियां, न ही नौकरशाह और न ही शहरी योजनाकारों को दिल्ली की जनता के कल्याण से कोई लेना-देना है। वे हरियाली के स्थान पर कंक्रीट का जंगल बनाना चाहते हैं। उनका कहना यह है कि पेड़ों की कटाई के स्थान पर क्षतिपूर्ति वनारोपण किया जाएगा। किंतु बडे पेड़ों की भरपाई पौधों से नहीं की जा सकती है। बडेÞ पेड़ ही प्रदूषण रोकने में सहायक होते हैं। इसके अलावा ये गर्मियों में पैदल चलने वालों को छाया भी प्रदान करते हैं। नियमों के अनुसार एक पेड़ की कटाई के बदले 10 पौधे लगाने होते हैं और अक्सर इसके लिए इतनी भूमि नहीं मिल पाती है।

    इसलिए पेड़ पौधे वहीं लगाए जाते हैं जहां भूमि उपलब्ध होती है और इससे उन क्षेत्रों को कोई लाभ नहीं मिल पाता है जहां से पेड़ों की कटाई होती है। प्राधिकारी अक्सर स्थानीय पौधों को नहीं लगाते हैं वे अक्सर सजावटी पौधों को लगाते हैं जिससे पर्यावरण संरक्षण में सहायता नहीं मिलती। क्षतिपूर्ति पौधारोपण वास्तव में जनता के साथ धोखा है। क्षतिपूर्ति पौधारोपण में पौधों की जीवित रहने की दर यदि 30 प्रतिशत रहे तो उसे अच्छा माना जाता है। किन्तु सामान्यतया केवल 10 प्रतिशत पेड़ ही जीवित रह पाते हैं। ट्रीज आॅफ डेल्ही के लेखक प्रदीप किशन के अनुसार क्षतिपूर्ति पौधारोपण की धारणा दोषपूर्ण है। जिन स्थानों पर ऐसा पौधारोपण किया जाता है वहां पर मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है। इसीलिए वे स्थान पेड़ों से खाली होते हैं और एजेंसियों का उद्देश्य केवल लक्ष्य पूरा करना होता है।

    वन विभागों का कार्य वनों और पेड़ों को बचाना है और वे क्षतिपूर्ति पौधारोपण सावधानी से नहीं करते हैं फिर भी वे बडेÞ पैमाने पर पेड़ों की कटाई करते हैं। पेड़ को एक स्थान से उठाकर दूसरे स्थान पर रोपित करने की विधि भी सफल नहीं है और नए स्थान पर अक्सर ऐसे पेड़ जीवित नहीं रह पाते हैं। दक्षिण दिल्ली की कालोनियों में पहले ही कुछ हजार पेडों की कटाई की जा चुकी है फिर भी दिल्ली की जनता की जागरूकता के चलते दिल्ली के पर्यावरण को कुछ हद तक बचा दिया गया है। अब संबंधित मंत्री ने इस मामले को अपने हाथ में ले लिया है और इन कालोनियों की पुनर्विकास परियोजना में व्यापक बदलाव किया जाएगा। इसका श्रेय दिल्ली के नागरिक समाज को जाता है जिसने एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन किया और प्राधिकारियों को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया।

    देश के अन्य शहरों में यह स्थिति नहीं है क्योंकि वहां का नागरिक समाज स्थानीय प्राधिकारियों के निर्णयों के विरुद्ध एकजुट नहीं हो पाता है। किंतु भोपाल जैसे शहरों में नागरिक समाज के विरोध के कारण सरकार को बिल्डर आधारित शहर विकास योजना 2005 को बदलना पड़ा। इसी तरह 2015 में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार को स्मार्ट सिटी के स्थान को बदलना पड़ा क्योंकि इसके विकास में हजारों पेड़ काटे जाने थे। देश के शहरी क्षेत्रों को दिल्ली से सबक लेना चाहिए और उन्हें विकास के बजाय अपने स्वास्थ्य और कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए। इसलिए जब कभी विकास और स्वास्थ्य में टकराव हो तो जनता को अपने हितों के लिए खड़ा होना चाहिए। विकास और पर्यावरण के बीच कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

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