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    एनआरसी पर राजनीतिक पैंतरा

    Political Panantra on NRC

    नेशनल सिटीजन रजिस्टर का आखिरी मसौदा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में तैयार किया गया था, जिसमें इसका खुलासा होने पर राजनीतिक पार्टियों ने इसे राजनीतिक पैंतरा बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। पश्चिमी बंगाल में तो यह राजनीति की धुरी बनता जा रहा है। हालांकि केन्द्रीय गृहमंत्री ने विवाद पैदा होने के बाद स्पष्ट किया था कि अभी भी लोगों के पास एनसीआर में शामिल होने का मौका है लेकिन राजनीतिक लाभ लेने वाले ऐसे स्पष्टीकरण का कोई मूल्य नहीं रह जाता। धड़ाधड़ की जा रही बयानबाजी ने समाज को दो वर्गांे में बांट दिया, एक विरोध करने वाले, दूसरे समर्थन करने वाले साथ ही देशभक्ति व देशद्रोहियों के फरमान जारी होने लगे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कोलकाता में अपनी रैली में एनआरसी का मुद्दा उठाते हुए त्रिणमूल सुप्रीमों ममता बनर्जी पर हमला किया है। लगता है एनसीआर देश की किसी समस्या को सुलझाने की प्रक्रिया न होकर यह भाजपा व त्रिणमूल कांग्रेस की लड़ाई बनकर रह गया है। मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है लेकिन राजनेताओं की बयानबाजी ऐसी है कि वह एनआरसी संबंधी निर्णय खुद की लेंगे। दरअसल आगामी लोक सभा चुनावों में असम व पश्चिमी बंगाल की सीटों की संख्या बहुत ही अहम है। देश की राजनीति की खासियत बन गई है कि समाज को बांटना। अच्छी बात यह होती कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को रैलियों की भाषणबाजी में न लाया जाता, अदालत का काम अदालत करती व राजनेता अपना काम करते। लेकिन रैलियों का माहौल देखकर ऐसा लगता है कि जैसे एनआरसी पर कार्रवाई भी शुरु हो गई। अदालत का निर्णय आने से पहले ही राजनेताओं ने लाखोंं लोगों की तकदीर का निर्णय हवा में ही सुना दिया है। राजनीतिक शिगूफेबाजी समाज में अमन-शांति को प्रभावित करती है व इससे राजनीतिक हिंसा बढ़ती है। केरल में पहले ही राजनीतिक हिंसा के भयानक परिणाम सामने आ चुके हैं, जिससे सीख लेनी चाहिए थी। एक तरफ प्रधानमंत्री भीड़ द्वारा हिंसा की निंदा करते हुए सख्ती इस्तेमाल करने का संदेश दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ एनआरसी के नाम पर राजनेता दो वर्गांे में टकराव का माहौल बना रहे हैं। एनआरसी देश की जरूरत व कानूनी प्रक्रिया है लेकिन इसे विकास प्रोजेक्टस की तरह न प्रचारित किया जाए। राजनेता राजनीतिक हितों के लिए समाज की अमन-शांति की बलि न दें ।

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