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    राजनीति में बढ़ता अपराधों को सरंक्षण

    Kairana News
    Kairana News: जमीनी विवाद में धारदार हथियार से हमले का आरोप

    राजनीति के अपराधीकरण का मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चिंता जताई है वहीं केंद्र सरकार का कहना है कि सर्वोच्च अदालत को इसमें दखल नहीं देना चाहिए। केंद्र सरकार की इस दलील के पीछे तर्क यह है कि अधिकांश मामलों में नेता बरी हो जाते हैं। यानि केवल आरोपों के आधार पर उन्हें अयोग्य घोषित कर देना गलत होगा। दूसरी ओर न्यायाधीशों की राय भी इस मामले में बंटी हुई है। मसलन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा का मानना है कि चुनाव आयोग खुद ही यह नियम बना सकता है कि आपराधिक मामलों में लिप्त उम्मीदवार को पार्टी का चुनाव चिन्ह नहीं दिया जाएगा। दो अन्य न्यायाधीश भी चीफ जस्टिस के इस मत का समर्थन करते हैं।

    लेकिन एक अन्य न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा का कहना है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो सकता है। यानि विपक्षी नेता उम्मीदवारों पर गलत आरोप लगा सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन आशंकाओं के मद्देनजर राजनीति के अपराधीकरण से आंखें मींच ली जाएं? सरकार की ओर से अटार्नी जनरल कहते हैं कि इस मसले पर न्यायपालिका संसद के अधिकार क्षेत्र को अपने हाथ में ले रही है यानि विधायिका के अधिकार पर अतिक्रमण कर रही है। जबकि प्रधान न्यायाधीश का कहना है कि संसद जब तक कानून नहीं बनाए तब तक क्या अदालत को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिए। जाहिर तौर पर राजनीति की मंशा इस मसले पर पारदर्शी नहीं दिखती।

    अपराध मुक्त राजनीति को लेकर संसद और सड़क पर बड़े-बड़े नेताओं ने बड़ी-बड़ी बातें कहीं। लेकिन अदालत में अटार्नी जनरल द्वारा रखा गया पक्ष इस बात की तस्दीक करता है वे सिर्फ बातें थीं, इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं। ऐसे में यदि सर्वोच्च अदालत कोई फैसला सुना भी दे तो उसका पालन होने में संदेह है। न्यायपालिका के कई फैसले ऐसे हैं जिनका पालन होने में लापरवाही बरती जा रही है। दरअसल कानून चाहे संसद बनाए चाहे सुप्रीम कोर्ट के आदेश से देश में कोई नियम लागू हो, उसका पालन होने में तब तक संदेह बना ही रहेगा जब तक पालन करवाने वाला इच्छाशक्ति नहीं दिखाएगा। संविधान में छुआछूत को गैरकानूनी घोषित किया गया है और सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं लेकिन क्या आजादी के 71 साल बाद भी समाज से छुआछूत मिट सकी है? क्या महिलाओं को हर क्षेत्र में बराबरी मिल सकी है? ऐसे में जब सरकार खुद ही सुप्रीम कोर्ट को इस मसले से दूर रहने की सलाह दे तो लगता है सियासत खुद अपराधमुक्त नहीं होना चाहती।

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