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    विवादित व घटिया बयानों की राजनीति

    Politics, Disputed, Defamatory, Statements

    देश में भड़काऊ एवं बिना सोच समझकर दिए बयानों से देश में अराजकता का माहौल निर्मित होता है। गत दिवस अमृतसर में निरंकारी भवन पर हुए हमले के बाद दुख व्यक्त करने की बजाए आम आदमी पार्टी के नेता व विधायक एचएस फूलकां ने बिना प्रमाण के घटना के पीछे आर्मी चीफ विपीन रावत का हाथ होने का बयान देकर राजनीति करनी शुरू कर दी।

    इससे पहले भी जब जस्टिस रंजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट तैयार हो रही थी, तो बेअदबी कांड के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने पर उन्होंने इस्तीफा देने की बात कही थी, जिसके बाद वह फिर मुकर गए थे। इसके अलावा बलजीत दादूवाल नाम का सिख धर्म का कथित प्रचारक बात-बात पर डेरा सच्चा सौदा का नाम उछाल देता है, जिसका उद्देश्य भी सिख भावनाओं को भड़काकर चंदा बटोरना व सुर्खियां बटोरना मात्र है। जो भी ऐसे बयान देकर देश की एकता एवं अखंडता को खंडित करते हैं, उनकी आलोचना एवं निन्दा होना जरूरी है।

    क्या नेताओं की जुबान अनजाने में फिसलती है या फिर जानबूझ कर जुबान फिसलाई जाती है। मानना है, नेताओं की जुबान फिसलना जिसे हम लोग विवादित बयान भी कहते हैं, वह जुबान जानबूझकर, चर्चा में रहने और लोगों का ध्यान आकर्षित कर खुद को टीआरपी बढ़ाने का खेल होता है। यह देखना जरूरी है कि जुबान किस नेता की फिसली है और किस मुद्दे पर फिसली है। बयान को ब्रेकिंग न्यूज बनाकर रातोंरात अनजाने से नेता को भी देश की जनता जान जाती है। या जाने-पहचाने नेता का कद और बढ़ जाता है।

    लंबे समय से देखा जाता रहा है, नेताओं और पार्टियों के नारे भी कम विवादित नहीं रहे हैं। अब वे चाहे तिलक-तराजू हो या फिर मंदिर वहीं बनाएंगे या फिर हवा-हवाई अच्छे दिन के नारे या जुमले हों। अब बात श्मशान से लेकर कब्रिस्तान पर आ गई है। हिन्दुस्तान की बात नहीं होती, राष्ट्रीयता की बात नहीं होती, ईमान, इंसानियत और इंसान की बात नहीं होती।

    गाय हो या राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान या राष्ट्र-चरित्र ये देश को जोड़ने के माध्यम हैं, इन्हें हिन्दुस्तान को बांटने का जरिया न बनाएं। ये सभी राजनय कर सकते हैं और उसके लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उनका लक्ष्य वोट है। सस्ती लोकप्रियता है। चुनावी बिसात बिछते ही या फिर वर्तमान राजनीति में जिस प्रकार से भाषा की मयार्दा टूट रही है और हमारे राजनेताओं का जो आचरण सामने आ रहा है, उसे कहीं से भी सभ्य समाज या युवा पीढ़ी के लिए आदर्श स्थिति नहीं कहा जा सकता।

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