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    राहुल की व्यथा और कांग्रेस की राजनीति

    Rahul's misery and Congress politics

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दिया, लेकिन पार्टी के बार-बार आग्रहों के बावजूद उसे वापस नहीं लिया। अपने इरादे पर अडिग रहे, लिहाजा सतही तौर पर उसे नाटक करार नहीं दिया जा सकता। राहुल गांधी व्यथित हैं। उनकी पीड़ा बयां भी हुई है कि लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बावजूद किसी भी मुख्यमंत्री, पार्टी महासचिव और सचिव, पार्टी प्रदेश अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारी ने इस्तीफे की पेशकश तक नहीं की। अपनी दादी स्व. इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत के दावेदार बने राहुल गांधी के आभामंडल में जबरदस्त कमी आई है।

    कांग्रेस अध्यक्ष सोचते थे कि लोकसभा चुनाव की करारी हार की जिम्मेदारी स्वरूप उनके पद से त्यागपत्र देने के पेशकश करते ही संगठन और सत्ता में बैठे कांग्रेस नेता भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी के नाम पर इस्तीफा भेज देंगे जिससे उनको अपनी मर्जी से पार्टी का नया ढांचा तैयार करने में आसानी होगी। लेकिन ऐसा नहीं होने पर उन्होंने इस पर पीड़ा जाहिर की है। नई सरकार को कार्यभार संभाले हुए भी एक माह होने को आ गया। कांग्रेस में अभी भी राहुल का इस्तीफा एक पहेली बना हुआ है। राहुल का ये कहना कि अगला अध्यक्ष उनके परिवार से नहीं होगा शुरूआत में अटपटा लगा क्योंकि पार्टी का एक वर्ग प्रियंका वाड्रा को आगे लाने के लिए अरसे से मुखर रहा है। लोकसभा चुनाव के समय जब उन्हें पार्टी महासचिव बनाकर पूर्वी उप्र की कमान सौंपी गई तब ये मान लिया गया कि अस्वस्थतावश सोनिया गांधी की सक्रियता में आई कमी के मद्देनजर उनके परिवार के ही एक सदस्य को उनकी जगह स्थापित करने का दांव चल दिया गया है।

    प्रियंका के शुरूआती तेवर देखकर तो ऐसा लगा मानों वे उप्र में मोदी लहर को बेअसर करते हुए कांग्रेस को पुनर्जीवित कर इतिहास रच देंगी लेकिन नतीजों ने साबित कर दिया कि वह ब्रह्मास्त्र भी किसी काम नहीं आया। अब समस्या पार्टी को पूरे देश में दोबारा खड़ा करने की है। दर्जन भर से ज्यादा राज्यों में तो कांग्रेस की एक भी लोकसभा सीट नहीं है। हिन्दी पट्टी में तो उसका सफाया हुआ ही पूर्व और पश्चिमी भारत में भी वह औंधे मुंह गिरी। ऐसे में राहुल के बाद प्रियंका को अध्यक्ष बनाने से गांधी परिवार की रही-सही भी धुल जाती। इसीलिये परिवार से बाहर के अध्यक्ष की बात उछली। लेकिन प्रियंका को पीछे करने में उनके पति के विरूद्ध चल रहे मामलों का भी हाथ है। मोदी सरकार की वापिसी के बाद राबर्ट वाड्रा के विरुद्ध चल रही जांचों में और तेजी आएगी। यदि वे दोषी पाए गये तब कांग्रेस पार्टी के लिए चेहरा छिपाना मुश्किल होगा।

    सवाल ये उठता है कि आखिरकार कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया किसे जाए क्योंकि भले ही राहुल के अनुसार उनके पारिवार का सदस्य पार्टी का मुखिया नहीं बने लेकिन वे और उनकी मां कभी नहीं चाहेंगी कि पार्टी का नियंत्रण हाथ से निकल जाए। ऐसे में किसी आज्ञाकारी और वफादार को ही राहुल का उत्तराधिकारी बनाये जाने की रणनीति बनाई गई परंतु जैसी उम्मीद थी वैसा नहीं हुआ। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों के अलावा पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में से किसी ने भी उनकी तरह हार की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की पेशकश नहीं की।

    पार्टी संगठन में किसी भी महासचिव और प्रदेश अध्यक्ष ने इस्तीफा नहीं भेजा है, लेकिन कांग्रेस मुख्यालय का भीतरी यथार्थ यह है कि वहां मोतीलाल वोरा सरीखे अति बुजुर्ग और पंजाब की प्रभारी महासचिव आशा कुमारी सरीखे नेता तो नियमित बैठे देखे जा सकते हैं। अन्य पदाधिकारी इस असमंजस में हो सकते हैं कि कांग्रेस अध्यक्ष कौन बनेगा और समीकरण कैसे तय होंगे? नेहरु-गांधी की विरासत के प्रति पूरी तरह से समर्पित कांग्रेसियों की पीढ़ी भी धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है और युवा पीढ़ी को सैद्धांतिक प्रतिबद्धता से ज्यादा अपने भविष्य की चिंता है। लेकिन जैसी राहुल ने उम्मीद की थी उस संख्या में त्यागपत्र नहीं आना कांग्रेस में गांधी परिवार के प्रति मोहभंग की स्थिति का संकेत है। बेशक राहुल कांग्रेस अध्यक्ष रहें या न रहें, लेकिन पार्टी की भावी बेहतरी के लिए जंगली घास को खत्म करना बेहद जरूरी है।

    कांग्रेस को घबरा कर मैदान नहीं छोड़ना चाहिए। उसे लोकसभा चुनाव में 12 करोड़ से ज्यादा वोट मिले हैं। इस समर्थन के मद्देनजर ही नया संगठन खड़ा किया जाए, नई गोलबंदी बने, पार्टी का ढांचा निश्चित हो, संपूर्ण देश में संगठन और काडर सक्रिय हो, नए बनाम पुराने की बहस नहीं छिड़नी चाहिए, बल्कि उसे अंजाम दिया जाए। कई पुराने नेता पार्टी पर बोझ बने हैं, लेकिन गांधी परिक्रमा कर अपने राजनीतिक अस्तित्व बरकरार रखे हैं। उनकी छंटनी होनी चाहिए और उन्हें आराम दिया जाए। यह तमाम कार्रवाइयां तभी संभव हैं, जब एक नियमित और स्थायी कांग्रेस अध्यक्ष होगा। कांग्रेस नेतृत्व को चाहिए कि वो आगामी विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर अभी से तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। और जल्द से जल्द इस्तीफे से लेकर तमाम तरह के कयासों पर रोक लगाने का काम करना चाहिए। इसी में कांग्रेस की भलाई है।

    संतोष कुमार भार्गव

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