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    भीड़ द्वारा हत्या निवारण कानून-अनावश्यक ?

    #West Bengal, #Life imprisonment, Unnecessary law to stop mob killing

    पश्चिम बंगाल सरकार ने विधान सभा में भीड़ द्वारा हत्या निवारण विधेयक पारित करवाकर भीड़ द्वारा हिंसा और हत्या को तीन वर्ष से आजीवन कारावास तक की सजा करने का प्रावधान किया है। इस विधेयक में किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाने के लिए आजीवन सजा और किसी की मृत्यु हो जाने पर मृत्यु दंड का प्रावधान किया गया है। विधेयक में यह प्रावधान भी किया गया है कि भीड़ द्वारा हत्या करने का षड़यंत्र करने तथा उसके लिए उकसाने को भी दंडनीय बनाया गया है। महिलाओं पर हमला सहित यौन उत्पीड़न के आधार पर भीड़ द्वारा हिंसा को भी भीड़ द्वारा हत्या के रूप में शामिल किया गया है।

    पीड़ित की मृत्यु की दशा में अपराधी को मृत्यु दंड या सश्रम कारावास की सजा और पांच लाख रूपए तक का जुमार्ना किया जा सकता है। किसी भी प्रकार से आक्रामक सामग्री का प्रकाशन या संप्रेषण को भी अपराध बनाया गया है और इसके लिए एक वर्ष जेल की सजा और 50 हजार रूपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है। विधेयक में गवाहों के संरक्षण और पीड़ित को मुआवजा देने का प्रावधान भी किया गया है। सोशल मीडिया के कारण आजकल पशुओं और बच्चों की उठाईगिरी की अफवाहें तेजी से फैलाई जा रही हैं और इनके चलते हिंसक प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा कि भीड़ द्वारा हिंसा एक सामाजिक बुराई है और इसे रोकने का कोई विरोध नहीं कर सकता है। किंतु इसमें कानून के प्रभावीपन के बारे में लोगों की राय अलग अलग हो सकती है।

    भारत में अपराध अभिलेख ब्यूरो भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं का आंकड़ा नहीं रखता क्योंकि इन्हें हत्या का मामला माना जाता है। इनकी संख्या बढ़ती जा रही है और इनमें दंड कम मिलता है। राजस्थान में गोरक्षकों द्वारा हत्या के मामले में सभी आरोपी बरी हो गए हैं। राजस्थान के बहरोड़ में पशु और दुग्ध विक्रेता पहलू खान की पिटाई के कारण मौत हो गयी थी और भीड़ द्वारा यह हमला इस शक के आधार पर किया गया था कि पशु मेले से जो वह गाएं ला रहा है वो काटने के लिए है। अलवर सेशन न्यायालय ने भीड़ द्वारा पहलू खान की हत्या के मामले में आरोपी छह व्यक्तियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। राजस्थान के मुख्यमंत्री ने इस मामले की दुबारा जांच करने के लिए विशेष जांच दल का गठन करने की घोषणा की है कि क्या इस मामले में सबूतों के साथ छेड़छाड़ हुई है या मामले को कमजोर बनाया गया है या जांच में कोई खामी रही है और इस मामले को न्यायालय में साबित न करने के लिए अभियोजन की विफलता के लिए जिम्मेदारी तय की जाएगी।

    पिछले वर्ष दिसंबर में मणिपुर विधन सभा में भीड़ द्वारा हिंसा में शामिल लोगों के लिए आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करने के बारे में विधेयक पारित किया। अगस्त 2019 में राजस्थान विधान सभा में भी एक ऐसा ही विधेयक पारित किया गया जिसमें भीड़ द्वारा हिंसा को गैर-जमानती अपराध बनाया गया और इसके लिए आजीवन कारावास तथा पांच लाख रूपए तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया। भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाओं के बढ़ने के कारण उच्चतम न्यायालय ने 2017 में केन्द्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वह इन पर रोक लगाने के लिए निवारात्मक, सुरक्षात्मक और दंडात्मक उपाय करे और इन अपराधों को भीड़ द्वारा भीषण अपराध कहा था। इनमें गैर-जिम्मेदारना और भड़काऊ संदेश, वीडियो भी शामिल थे। साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए प्रत्येक जिला न्यायालय में फास्ट टैÑक न्यायालय बनाने का भी निर्देश दिया था।

    न्यायालय ने भीड़ द्वारा हत्या को एक अलग अपराध घोषित किया और उसके लिए दंड का प्रावधान किया। किंतु उच्चतम न्यायालय के इन निदेर्शों को नजरंदाज किया गया। भीड़ द्वारा हत्या के मामले बढते जा रहे हैं। गोरक्षक अक्सर बिना सबूत के ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों और राष्ट्रीय मानव अधिकार संगठन को उच्तचम न्यायालय के इन निदेर्शों के प्राप्त होने और इस निर्णय को लागू करने के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक अधिकार संपन्न मंत्री समूह का गठन किया गया। भीड़ द्वारा हिंसा को किसी समूह द्वारा किसी व्यक्ति की सोच-समझकर न्यायेत्तर हत्या के रूप में परिभाषित किया गया है। यह कार्य सार्वजनिक रूप से किया जाता है और इसका उद्देश्य व्यक्ति को दंडित करना और ऐसा करने वाले समूह को धमकाना होता है। यह सामाजिक नियंत्रण का अनौपचारिक उपाय होता है। पीड़ित किसी विशेष समूह या विशेष विचारधारा का होता है। आज भी सभी समाजों में भीड़ द्वारा हिंसा जारी है हालांकि इसे एक बर्बर कृत्य माना जाता है।

    भीड़ द्वारा हत्या का वाक्यांश का संबंध अमरीकी क्रांति से है। अमरीका में लिंच लॉ बिना सुनवाई के दंड देने के लिए प्रयोग किया जाता था। अमरीका में गृह युद्ध के दौरान और उसके बाद ऐसी घटनाएं आम बात हो गयी थी और इसके शिकार अफ्रीकन अमरीकी थे। 1918 में अमरीकी कांग्रेस में एलसी डायर ने भीड़ द्वारा हत्या निवारण विधेयक पेश किया और इसे प्रतिनिधि सभा ने 1922 में पारित किया किंतु सीनेट ने इसे पारित नहीं किया तथा 2018 तक यही स्थिति बनी रही जब सीनेट ने सर्वसम्मति से भीड़ द्वारा हत्या के पीड़ित लोगों के लिए न्याय अधिनियम पारित किया जिसे अभी प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित किया जाना है।

    इस संबंध में मार्क ट्वेन का उल्लेख करना आवश्यक है जिन्होने अमरीका को यूनाइटेड स्टेट्स आॅफ लिंचरडम में बदलने की आशंका व्यक्त की थी। इस शीर्षक से प्रकाशित उनके लेख में 1901 में मिशौरी में बडेÞ पैमाने पर भीड़ द्वारा हत्या की घटनाओं का उल्लेख है। लैटिन अमरीकी देश विशेषकर ब्राजील भीड़ द्वारा हत्या के मामलों के लिए कुख्यात है जहां इसे लोकप्रिय न्याय कहा जाता है किंतु इसके कोई विश्वसनीय आंकडे उपलब्ध नहीं हैं। उन देशों में भीड़ द्वारा हत्या आम बात है जहां पर अपराध अधिक होते हैं। नाइजीरिया में भीड़ द्वारा हत्या को जंगल न्याय कहा जाता है तो दक्षिण अफ्रीका में यह नक्सलवाद का हिस्सा रहा है। रंगभेद के दिनों में दक्षिण अफ्रीका में ऐसी घटनाएं आम बात थी। कुछ लोगों का यह भी मत है कि भीड़ द्वारा बड़े पैमाने पर हत्याओं का मुख्य कारण प्राधिकारियों द्वारा न्याय दिलाने में विफल रहना है जिसके चलते लोगों का पुलिस से विश्वास खत्म हो गया है। कुछ स्थानों पर आज भी छोटे-मोटे अपराधों के लिए स्थानीय न्याय प्रणली प्रचलित है।

    जघन्य तरीके से किए गए हत्या का यह अपराध कुछ समूहों के प्रति दुर्भावना विभिन्न पंथों के बीच दुश्मनी और धार्मिक असहिष्णुता से जुडा हुआ है। यह मूलत: कानून और व्यवस्था की समस्या है। इसलिए इसके लिए दांडिक प्रावधान उपलब्ध होने चाहिए। इस नए कानून के प्रभावीपन के बारे में संदेह है क्योंकि जो लोग कानून का उल्लंघन करते हैं और सीधा न्याय करने में विश्वास करते हैं वे इसका उल्लंघन करने से नहीं हिचकेंगे। यह कानून एक तरह से अनावश्यक है और इसके आश्चर्यजनक परिणामों की आशा नहीं की जा सकती है। विशेषकर तब जब लोगों का कानून और न्याय तथा सौहार्दपूर्ण सामाजिक संबंधों से विश्वास उठता जा रहा हो।
    -डॉ. एस सरस्वती