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    जश्न किसका और क्या, आगे की राह कठिन

    Next government

    -हमारे देश में सब कुछ राजनीति से शुरू होकर राजनीति पर खत्म होता है और देशवासी असहिष्णुता और अपराधीकरण के बढते प्रहारों को सह रहे हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के बारे में राजनीतिक आक्रोश तथा गुस्साई जनता को ध्यान में रखते हुए नए वर्ष में नए बदलाव आने चाहिए। आम आदमी की त्रासदी यह है कि व्यवस्था के प्रति उसकी निराशा पर कोई ध्यान नहीं देता है जो कई बार आक्रोश में बदल जाती है और लोग कानून अपने हाथ में लेकर दंगा करने लगते हैं, बसें जलाने लगते हैं और लूटपाट करने लगते हैं।

    एक साल और बीत गया है। यह उथल-पुथल भरा साल रहा है जिसमें जीत और हिंसा, पीडा और आनंद देखने को मिले तथापि इस वर्ष को विदा करते हुए और नए वर्ष में प्रवेश करते हुए आशा की जाती है कि आने वाला वर्ष सुखद होगा। क्या ऐसा होगा? प्रश्न उठता है कि क्या 2020 मोदी का ब्रेक ईयर होगा? नि:संदेह वे भारत में सबसे लोकप्रिय नेता बने रहेंगे क्योंकि उनका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है। केन्द्र में सर्वाधिक बहुमत के साथ दोबारा सत्ता में लौटने के केवल सात माह बाद ही भाजपा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव हार गई है और हरियाणा में उसे जननायक पार्टी के साथ गठबंधन की सरकार बनानी पड़ी। इससे पूर्व पिछले दिसंबर में भाजपा को छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने शिकस्त दी और इन सबके चलते जहां एक समय देश के 70 प्रतिशत भाग पर भाजपा का शासन था वह घटकर 40 प्रतिशत रह गया है।

    साथ ही दिल्ली और बिहार जहां पर शीघ्र चुनाव होने वाले हैं वहां भी भाजपा के आसार अच्छे नहीं लगते। इसे मोदी के जादू की असफलता नहीं कहा जा सकता है क्योंकि भाजपा की उपलब्धियों के नारों और रणनीतियों में नएपन का अभाव है जो मतदाताओं को नहीं लुभा पाए। अपने अहंकार और असंवेदनशीलता के लिए भगवा संघ स्वयं जिम्मेदार है। भाजपा को एक कट्टरवादी पार्टी के रूप में देखा जाता है और यह हर किसी के साथ अपनी वर्चस्ववादी और मनमर्जी की नीति अपनाने लगा जिससे स्थिति जटिल हुई साथ ही भाजपा ने महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में ऐसे समुदायों के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया जिनका उन राज्यों में वर्चस्व नहीं था और जो उन राज्यों में बहुसंख्यक समुदाय का समर्थन लेने में विफल रहे। साथ ही भाजपा के प्रति लोगों की सहानुभूति भी धीरे धीरे कम होने लगी क्योंकि भाजपा सरकार अपने वायदों को पूरा नहीं कर पायी।

    अर्थव्यवस्था का हाल अपेक्षानुरूप नहीं रहा। घरेलू खपत मे गिरावट आयी, विनिर्माण, निर्माण, भूसंपदा आदि क्षेत्रों में मंदी देखने को मिल रही है, औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है, निर्यात घट रहा है, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में अव्यवस्था है, ग्रामीण लोगों में असंतोष है, शहरी लोग उदासीन हैं, युवक इस बात से गुस्साए हुए है कि सरकार उन्हें रोजगार नहीं दे पा रही है साथ ही धार्मिक धु्रवीकरण हो रहा है और पार्टी के मत प्रतिशत में गिरावट आ रही है जिसके चलते उसे चुनावी लाभ नहीं मिल रहा है।

    तथापि मेरा मानना है कि भाजपा को मिली हारों और आर्थिक मंदी के बावजूद पार्टी सत्ता की दौड से बाहर नहीं हुई है। वस्तु: पार्टी आज भी जनता में लोकप्रिय है। हो सकता है लोग उसके शासन से निराश हो किंतु उनका सरकार से मोह भंग नहीं हुआ है और इसका सबसे बडा कारण मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और विकल्पहीनता की स्थिति में उनकी नंबर एक की स्थिति है।

    फिलहाल ऐसा लगता है वह एकजुट है और मोदी की लोकप्रियता घट रही है और भाजपा की लोकप्रियता भी घट सकती है किंतु इसके बावजूद भाजपा और उसकी सरकार इस बात से संतोष कर सकती है कि उसने अपने दूसरे कार्यकाल में अपने मुख्य एजेंडा के अधिकतर मुद्दों को पूरा किया है। अयोध्या मुद्दे पर न्यायालय का मंदिर के पक्ष में निर्णय आया है। अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया गया है। तीन तलाक को अवैध घोषित कर दिया गया है और नागरिकता संशोधन अधिनियम के माध्यम से अवैध अप्रवासियों की समस्या से निपटा जा रहा है। यह उसके लिए एक वैचारिक सफलता है। भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसवक संघ के मूल मुद्दों में केवल समान नागरिकता संहिता बचा हुआ है तथा जनसंख्या नियंत्रण के लिए सरकार एक विधेयक लाने की तैयारी में है।

    किंतु हैरानी की बात यह है कि मोदी ने अभी अर्थव्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया है। अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7 प्रतिशत के अनुमानित स्तर से घटकर केवल 4.5 प्रतिशत रह गयी है और नागरिकता संशोधन अधिनियम तथा राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर संपूर्ण देश में आंदोलन हो रहा है। इसके अलावा मोदी को विकास के मुख्य मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा जो लोगों की रोटी, कपडा, सडक और पानी से जुडे हुए हैं। मोदी ने अपने प्रशासन को चलाने के लिए अभी सोच का परिचय नहीं दिया है न ही उन्होंने व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत किया है। उनके सुधार के एजेंडा के राजनीतिक विरोध के चलते उनका आर्थिक सुधार कार्यक्रम और जटिल बन गया है।

    नि:संदेह नोटबंदी के बाद नमो और उनके सहयोगी दिशा भटक गए हैं। उनकी सरकार महंगाई, कृषि संकट और बढती बेरोजगारी जैसी मुख्य समस्याओं पर ध्यान नहीं दे पायी है। सरकार का आम आदमी के हितैषी होने का मुद्दा लगता है विफल हो रहा है जिसके चलते प्याज की कीमतें नेतृत्व को रूला रही है। खाद्यान्न, तेल, चीनी, गेहूं, चावल आदि की कीमतें बढ रही हैं। बिजली और पानी की दरों में वृद्धि से आम आदमी का जीवन कठिन हो रहा है। क्या इस वित्त वर्ष के अंत में सकल घरेलू उत्पाद की 4 प्रतिशत की वृद्धि दर लोगों को महंगाई से राहत दिला पाएगी? इसके लिए हमारा विपक्ष भी दोषी है क्योंकि विपक्षी दल अलग उद्देश्यों और एजेंडा के साथ अलग अलग दिशाओ में भटक रहे हैं।

    विपक्ष में आज भी बिखराव है। सीधे मुकाबले में कांग्रेस द्वारा भाजपा को शिकस्त देने के कारण उसके आसार कुछ सुधर रहे हैं और जिसके चलते वह देश के 15 प्रतिशत भाग पर शासन कर रही है किंतु अभी वह एक विकल्प के रूप में नहीं उभरी है। ममता, पवार, नीतीश, स्टालिन आदि सभी नेताओं में शीर्ष पद के लिए होड लगी हुई है। उन्हें हार के अनुभवों से सबक लेना चाहिए कि स्थानीय स्तर पर एकता से भाजपा को हराया जा सकता है।

    झारखंड मे कांग्रेस और झामुमो के गठबंधन के चलते वह भाजपा को हरा पाए। महाराष्ट्र में पार्टी ने भाजपा की पूर्व सहयोगी शिव सेना के साथ रणनीतिक गठबंधन किया और संघ को शिकस्त दी। कांग्रेस के लिए आवश्यक है कि वह अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए मोदी की लोकप्रियता में सेंध लगाए। राजनीतिक लडाई जीतना उद्देश्य की प्राप्ति नहीं है क्योंकि इसके साथ कई प्रत्याशित-अप्रत्याशित चुनौतियां पैदा होती हैं और यही स्थिति हार में भी है। इसलिए आगामी विधान सभा चुनावों के परिणामों का भाजपा तथा विपक्षी दलों पर व्यापक प्रभाव पडेगा। शिव सेना से नाता तोडना और शिरोमणि अकाली दल और जद (यू) की नाराजगी को देखते हुए आगामी वर्षों में भाजपा को नए मित्र, सहयोगी ढूंढने होंगे।

    देखना यह है कि क्या वर्ष 2020 मोदी की उपलब्धियों का वर्ष रहेगा। क्या मोदी जमीनी स्तर पर विकेन्द्रीकृत प्रशासन के माध्यम से त्वरित विकास सुनिश्चित कर पाएंगे। प्रशासन को लोगों की बढती आशाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप एक परिपक्व और सार्थक लोकतंत्र के रूप में चला पाएंगे?

    पूनम आई कौशिश

     

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