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    अमन के लिए युद्ध

    War for peace

    कभी कहा जाता था कि अमन शांति चाहते हो तो युद्ध के लिए तैयार रहो लेकिन यह कहावत वर्तमान समय में फिट बैठती नजर नहीं आ रही। ईरान और अमेरिका में हालात ऐसे बने हुए हैं कि यदि उनके बीच जनरल कासिम की हत्या का मामला ठंडा नहीं पड़ा तब करोड़ों लोगों का भगवान ही रक्षक है। अमेरिका ने इराक में हमला कर ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद और भी कार्रवाईयां करने की धमकी दी है, दूसरी ओर ईरान ने जवाबी कार्रवाई की है। दरअसल अब यह मामला अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया। बल्कि यूरोप से लेकर एशिया तक चिंता का विषय बना हुआ है। इराक में अमेरिका ने उस वक्त हमला किया जब रूस, चीन और ईरान की सेनाएं संयुक्त युद्ध अभ्यास कर रही हैं।

    मकसद स्पष्ट है अमेरिकी हमले को रूस व चीन जैसी ताकतें बर्दाश्त नहीं करेंगी। ईराक भी ईरान का समर्थन करता दिख रहा है, जिसकी संसद ने अमेरिकी सेनाओं की ईराक से वापिसी का प्रस्ताव पास कर दिया है। यदि युद्ध हुआ तब रूस, चीन भी पीछे हटने वाले नहीं। उत्तरी कोरिया भी रूस और चीन के साथ जाने वाला है। इसी तरह यूरोपीय देशों का झुकाव अमेरिका की तरफ है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत सहित कई देशों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है, उधर अमेरिका अरब में तनाव को दो दशक पूर्व ही धार्मिक रंगत दी जा चुकी है।

    जब सन 2001 में अमेरिका ने अफगानिस्तान में हमला किया था। सैन्य ताकतों के मामले में यदि ईरान कमजोर साबित हुआ तब रूस और चीन का दखल पूरे विश्व के लिए घातक साबित होगा। अत: ईरान जो इमेरिका से बदला लेने की हिमाकत कर रहा है वह बिना किसी तीसरे की शह के नहीं हो रहा। इस दौर की दिलचस्प बात यह भी है कि अमेरिका की राजनीति से ज्यादा विश्व में घटित अन्य घटनाएं भी अधिक महत्व रख रही हैं। ट्रम्प इस वर्ष फिर राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे हैं। अमेरिका के नेता चुनाव जीतने के लिए युद्ध को भी चुनावी रणनीति में रखते हैं। अमेरिकी ताकतें व ट्रम्प का सख्त रवैया दोनों मिलकर कोई बड़ा खतरा बन सकते हैं। अमेरिका का निर्णय लेने का यही तरीका रहा है कि वह तबाही के बाद ही घटना का अंदाजा लगाता है।

    सद्दाम हुसैन के कार्यकाल में ईराक के खिलाफ हुई सैन्य कार्रवाई में अमेरिका ईराक के पास जैविक एवं रासायनिक हथियारों के आरोप साबित नहीं कर सका, जिनके कारण ईराक पर हमला किया गया था। अब ट्रम्प व रोहानी के तेवरों से यही लग रहा है कि अब अमन शांति के लिए मांगी जाने वाली दुआएं ही इस खतरे को टाल सकती हैं।

     

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