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    बचाव की लक्ष्मण रेखा है लॉकडाउन

    Laxman Rekha of Rescue is Lockdown
    कोकोरोना वायरस ने लगभग पूरी दुनिया में अपने पावं पसार लिये हैं। भारत में कोरोना संक्रमण का असर बढ़ने लगा है। संक्रमण तीसरे चरण की ओर तीव्र गति से बढ़ रहा है। कोरोना वायरस के चलते चेतावनी दशार्ती है आम जनमानस इसकी गम्भीरता के प्रति लापरवाह है। आवश्यक है कि हम सभी इसका सामुदायिक स्तर पर प्रसार रोंके।
    विडम्बना है देश के कुछ शहरों में आम जनता ने इस व्यवस्था का पालन नहीं किया। वहीं कर्फ्यू के नियमों को तोड़ना विभिन्न राज्यों में दशार्ता है कि हम इस संकट की घड़ी में किस तरह का बर्ताव कर रहे हैं। ये लोग इस गलती में जी रहे हैं कि कोरोना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। इटली, ईरान में तो मौतों का आंकड़ा थमने के बजाय लगातार बढ़ रहा। ईरान में मात्र 16 दिन में कोरोना का प्रकोप इतना बढ़ गया कि हालात अब बेकाबू हो चुके हैं। डॉक्टर पूरी कोशिश कर रहे हैं कि मरीजों को बचाया जा सके। समय रहते भारत सरकार ने जो कदम उठाये हैं सराहनीय हैं। लेकिन अभी भी कुछ लोग इसे अनदेखा कर रहे हैं और दूसरों की जिंदगी को दांव पर लगा रहे हैं। सरकार को इनके खिलाफ हर प्रकार का सख्त कदम उठाना चाहिए।
    भारत सरकार ने कोरोना की गंभीरता को देखते हुए देश में 21 दिनों का लॉकडाउन लागू हो चुका है। नागरिकों को इस दौरान घर में ही सिमटे रहना है। यह नजरबंदी या हिरासत नहीं है, बल्कि मौजूदा दौर में राष्ट्रधर्म और देशसेवा है। इनसानी सेहत और जिंदगी को बचाना है। प्रधानमंत्री ने आगाह किया है कि यदि इन 21 दिनों में भी नहीं संभले, तो देश और आपका परिवार 21 साल पीछे चला जाएगा। कई परिवार तो तबाह हो सकते हैं, लिहाजा देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने एक खूबसूरत उपमा का इस्तेमाल किया है कि सभी नागरिकों को अपने घर की दहलीज के बाहर एक लक्ष्मण-रेखा खींचनी है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से बचने के लिए वह लक्ष्मण रेखा न लांघी जाए। इस रेखा का ऐतिहासिक महत्त्व है कि लक्ष्मण रेखा लांघने के फलितार्थ क्या होते हैं।
    हमारे देश के आम लोगों को दुनिया के दूसरों देशों के कोरोना वायरस के खौफनाक मंजर को देखते हुए गंभीरता से लेते हुए समय रहते ही सावधानियां बरत लेनी चाहिए। अगर यह महामारी हमारे देश में बेकाबू हो जाती है, तो यह 1918 का इतिहास दोहरा सकती है। सन् 1918 में हमारे देश में स्पैनिश फ्लू ने महामारी का रूप लिया था, इसकी चपेट में आने से लाखों-करोड़ों लोगों की जान चली गई थी। कोरोना दुनिया से जल्दी अपना कहर खत्म करे, इसके लिए सारी दुनिया को कोरोना से बचने के तौर-तरीकों, इलाज के साथ दुआएं भी मांगनी चाहिए। दुनिया के 44 देश संपूर्ण लॉकडाउन घोषित और लागू कर चुके हैं। जाहिर है कि इनसान आपस में बेहद कम मिल सकेंगे और सामाजिक दूरी का फामूर्ला भी इस्तेमाल किया जा सकेगा। अब कोरोना से बचने के लिए यही आखिरी चारा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ही यह फामूर्ला दिया था, लिहाजा संयुक्त राष्ट्र ने भारत सरकार और प्रधानमंत्री के इस फैसले की तारीफ की है और भारत के समर्थन का ऐलान भी किया है।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन की निगाहें अब भारत के घटनाक्रम पर हैं। उसे हमारे देश की क्षमताओं पर भरोसा है। चेचक और पोलियो के खिलाफ सफल लड़ाई के बाद अब कोरोना के संदर्भ में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन को भारत से ही अपेक्षाएं हैं। इसके पीछे की दृष्टि और सोच यह हो सकती है कि चीन के बाद सबसे ज्यादा और घनी आबादी भारत में ही है। यदि संक्रमण सामुदायिक स्तर पर फैलता हुआ विस्तार पाता है, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन का ही आकलन है कि वह दौर किसी त्रासद प्रलय से कम नहीं होगा। ऐसी संभावनाओं के मद्देनजर पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन का फैसला बेहद मानवीय और दूरगामी लगता है। खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह एक किस्म से कर्फ्यू ही है, लेकिन भारत की गरीब, अनपढ़, अबोध, वंचित जमात का मानस अब भी लॉकडाउन की अनिवार्यता को समझ नहीं पा रहा है। इस जमात की मजबूरी भी है।
    महानगरों में एक छोटे से कमरे में 8-10 मजदूर रहते, सोते, खाते-पीते हैं। सोचिए कि यदि कोई व्यक्ति कोरोना से संक्रमित होगा, तो उस वायरस का फैलाव कितनी तेजी से होगा? गरीब और मजदूर तबका पलायन करके गांवों को लौटा है। देश के गांवों में स्वास्थ्य और स्वच्छता के बुरे हाल हैं। यदि प्रधानमंत्री की 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा के बाद एक सामान्य भीड़ किराने, दूध, दवा और सब्जी आदि की दुकानों की तरफ भागी है और वहां लंबी कतारें दिख रही हैं, तो साफ है कि हमारी जनता भविष्य के प्रति आशक्ति नहीं है। देश की सरकारें, मीडिया, डाक्टर और बौद्धिक जन भारत के बुनियादी यथार्थ को एकदम नहीं बदल सकते।
    कोरोना वायरस से संक्रमित होने वालों की संख्या 600 को पार कर चुकी है। हम वैश्विक आंकड़े नहीं दे रहे हैं, क्योंकि वे अत्यंत भयावह और खौफनाक हैं, लेकिन भारत में संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लिहाजा इस लॉकडाउन का खौफ मत खाइए। यह देश की अग्नि-परीक्षा का समय है। बेशक हमारी आर्थिक स्थितियां भी बेहतर नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने भी स्वीकार किया है कि हमें आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी। फिलहाल संकट देश और नागरिकों को बचाने का है, लिहाजा लॉकडाउन का अक्षरशरू पालन कीजिए। आर्थिक पैकेज भी घोषित होगा। वित्त मंत्री ने कुछ रियायतें दी हैं, लेकिन फिलहाल तो आंख लक्ष्मण रेखा पर होनी चाहिए। चीन, इटली, अमरीका के बाद हमें कोरोना का अगला केंद्र बिंदु नहीं बनना है। इसी के मद्देनजर घर में रहिए और 14 अप्रैल तक के वक्त बीतने का इंतजार कीजिए।
    चुनौती यह है कि अभी वायरस का प्रभाव दूसरे चरण में है। यदि लापरवाही बरती जाती है तो यह तीसरे घातक चरण में भी पहुंच सकता है तब स्थिति हमारे नियंत्रण से बाहर होगी। सरकार की हालिया कोशिशें इसे तीसरे चरण से पहले रोकने की है। यदि कामयाबी नहीं मिलती है तो लॉकडाउन लंबा भी खिंच सकता है। चीन के बाद दुनिया के तमाम विकसित देशों ने भी लॉकडाउन का सहारा लिया। क्या लॉकडाउन ही उपचार का अंतिम उपाय है? डब्ल्यूएचओ के कुछ अधिकारी इसे अंतिम उपाय नहीं मानते। वे मानते हैं कि इसके साथ ही बड़े पैमाने पर लोगों की जांच का क्रम जारी रखा जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी संक्रमण का खतरा बना रह सकता है। हालांकि, डब्ल्यूएचओ ने भारत में रेल-बस सेवाओं की बंदी और लॉकडाउन जैसे प्रयासों की सराहना भी की है। मगर साथ ही कहा है कि लगातार टेस्टिंग हो और पीड़ितों के संपर्क में आने वाले लोगों को गंभीरता से खोजा जाये। छह सौ से अधिक संक्रमित लोगों की संख्या हमारी चिंता का विषय होना चाहिए।
    देश के चिकित्सा तंत्र को चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। विगत में स्वाइन फ्लू, बर्ड फ्लू, सार्स आदि कई संक्रामक बीमारियों से जूझने के चिकित्सीय उपाय खोजे गये हैं। वर्तमान में कोरोना वायरस महामारी के निपटने में जनता कर्फ्यू का तो प्रयोग बहुत सफल और प्रशंसनीय रहा है। इस महामारी के संक्रमण के फैलने से बचाव के सरकारी प्रयासों को जनता का समर्थन भी है। लोगों का काम है, महामारी के यथाशीघ्र समाप्ति करने के प्रयासों में शासन प्रशासन का सहयोग करें। लॉकडाउन को अवकाश नहीं राष्ट्रीय कर्तव्य के तौर पर लेना होगा, और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। इसी में सबका भला है।

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