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    अनाज के अंबार, फिर भी भुखमरी का कलंक

    Amber Of Grains, Still Stigma Of Starvation

    गेहूँ हो या धान की फसल मंडियों में अनाज के अंबार लग जाते है। कई किसान केवल इसी कारण देरी से मंडी में फसल लेकर आते हैं कि वहां जगह ही नहीं होती लेकिन ग्लोबल हंगर इंडैक्स की इस साल की रिपोर्ट भी पिछले सालों की तरह भारत के लिए चिंताजनक है। भुखमरी में 119 देशों में हमारा नंबर 103वां आया, जिसमें पिछले साल के मुकाबले गिरावट दर्ज की गई। 2017 में 100वां नंबर था। केंद्र की मोदी सरकार को गंभीर होना चाहिए क्योंकि 2014 के बाद 55वें स्थान से निरंतर नीचे आता हुआ 2015, 2016, 2017 में क्रमवार 80वें, 97वें, 100वें स्थान पर पहुंच गया। हैरानी की बात यह है कि हमारे देश में हर साल लाखों टन अनाज बर्बाद होता है। कुछ हद तक तकनीक के प्रयोग से योग्य लाभपात्रियों तक अनाज पहुंचा है। ई-पोस मशीनें कारगर साबित हुई हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन मशीनों का प्रयोग से पहले भुखमरी के मामले में देश की हालत बेहतर थी। लंबे समय तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार को भुखमरी का एक बड़ा कारण माना जाता था।

    अनाज सुरक्षा गारंटी कानून लागू होने के बाद सुधार की उम्मीद थी लेकिन स्कीम फिर ही प्रभाव दिखाती है, जब भ्रष्टाचार खत्म हो। पिछले दिनों पंजाब में बड़ी मात्रा में अनाज बर्बाद हुआ, जो बिहार के गरीबों को बांटा जाना था। भ्रष्टाचार खत्म न होने के कारण यह अनाज बर्बादी की भेंट चढ़ रहा है। विशेष तौर पर निम्न स्तर पर कार्रवाई बहुत कम हो रही है। कुछेक मामलों में सजाएं होती हैं, दूसरी तरफ सरकारी गोदामों के साथ जुड़े छोटे कर्मचारियों की जायदादों में बड़ा इजाफा हो रहा है। प्रधानमंत्री नरिन्दर मोदी ने दावे से कहा था, ‘न खाऊँगा, न खाने दूंग’, वह चाहे खाते हों या न लेकिन दूसरों को खाने से नहीं रोक सके। देश में भ्रष्टाचार के कारण हालात हम देख ही रहे हैं। ग्लोबल इंडैक्स ने सच्चाई को उजागर कर दिया है। 55वें स्थान से सीधा दोगुनी गिरावट के साथ देश 103वें स्थान पर आ गया। लगता है कि राजनेताओं के लिए सरकार का पहला व आखिरी साल (चुनावी साल) ही महत्वपूर्ण होता है। बीच वाले साल में खूब भ्रष्टाचार के साथ मनाए जाते हैं। देश के कुछ गिनती के निजी संस्थानों का विश्व के अमीरों में शुमार होना ही देश की सफलता का मापदंड नहीं। अनाज की बहुतायत के बावजूद अनाज की कमी सिस्टम में खराबी का प्रमाण है। सरकारी घोषणाओं को पूरे तरीके के साथ लागू करने से ही सुधार संभव है। भुखमरी के आंकड़ें शर्मसार करने वाले हैं। सरकार को इससे सबक लेना चाहिए।

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