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    ‘सू की’ को एमनेस्टी की नसीहत

    Suu Kyi

    एमनेस्टी इंटरनेशनल ने रोहिंग्या मुस्लमानों पर हुए अत्याचार के मामले में म्यांमार की क्रांतिकारी नेता ‘‘सू की’’ से ‘अम्बैसडर काशियंस अवार्ड’ वापिस ले लिया है। संस्था ने यह पुरूस्कार ‘सू की’ को तब दिया था जब वह संघर्ष के दौरान नजरबंद थी। दरअसल ‘सू की’ के संघर्ष पर पूरे विश्व की निगाह टिकी हुई थी और जब उन्हें पुरूस्कार मिला तो सभी ने स्वागत किया था।

    इस नेता को शान्ति के लिए नोबल पुरूस्कार भी प्राप्त है। दूसरे देशों में दौरों पर भी इस नेता का स्वागत हुआ लेकिन ‘सू की’ की छवि उस वक्त धूमिल पड़ने लगी जब देश में सैनिकों का शासन समाप्त होने के बावजूद मानवीय अधिकारों के हनन की घटनाएं होना जारी रहीं। म्यांमार में रोहिंग्या के मामले में ‘सू की’ के नजरिए की कड़ी अलोचना हुई थी। विश्व के अधिकतर लोकतांत्रिक देश इस विचारधारा का समर्थन करते हैं कि रोहिंग्या मुस्लमान म्यांमार के नागरिक हैं और उन्हें पूरे अधिकार व सुरक्षा मिलनी चाहिए।

    रोहिंग्या नौवीं सदी से म्यांमार में बसे हुए थे और कई पीढ़ियां गुजर जाने के बावजूद उन्हें नागरिकता व सम्मान न मिलने की निंदा हुई थी। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्या पर हिंसा को ‘सामूहिक हत्याकांड’ करार दिया है। भले ही आलोचना के बाद ‘सू की’ के रवैये में बदलाव आया और उन्होंने रोहिंग्या के संदर्भ में नरम बयानबाजी का इस्तेमाल किया लेकिन यह बात स्पष्ट है कि सत्ता से बाहर व सत्ता में आने पर नेताओं के बोल बदल जाते है।

    ‘सू की’ ने जिस कठोरता से लोकतंत्र व मानवीय अधिकारों के लिए म्यांमार सरकार व सैनिक शासकों के खिलाफ आवाज बुलंद की थी, सत्ता में आने के बाद उनकी सोच मानवीय अधिकारों से हटकर तंत्र की कठोरता से जुड़ती गई। शांति की नोबल पुरूस्कार विजेता मलाला यूसफजई ने भी ‘सू की’ के बदले हुए रवैये पर सवाल उठाए थे। लोकतंत्र के बावजूद म्यांमार के संविधान में सेना भी नागरिक सरकार में है। म्यांमार के कई शासक रोहिंग्या के साथ किसी तरह का भेदभाव न करने के वायदे से मुकर गए हंै।

    बजाय रोहिंग्या को बांग्लादेश या भारत की तरफ धकेलने के उन्हें उसी देश में ही सम्मान देना चाहिए जहाँ के वे निवासी हैं। पुरूस्कार वापिसी की कार्रवाई ‘सू की’ को नसीहत देने के लिए काफी है। एमनेस्टी द्वारा पुरूस्कार वापिस लेने के बाद पुरूकार का सम्मान कायम रहेगा। इससे म्यांमार सरकार पर रोहिंग्या का मामला हल करने के लिए दबाव बढ़ेगा और ‘सू की’ जैसी नेता को अपने अंदर की आवाज सुननी होगी।

     

     

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