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    Bee Keeping: मधुमक्खी के परागण से बढ़ता है फसलों में उत्पादन

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    Bee Keeping: मधुमक्खी के परागण से बढ़ता है फसलों में उत्पादन

    जोबनेर यूनिवर्सिटी में मधुमक्खी पालन पर मंथन | Bee Keeping

    जयपुर (सच कहूं न्यूज)। श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर (Shri Karan Narendra Agricultural University) में वैज्ञानिक डॉ. डीपी अब्रोल ने विश्वविद्यालय का दौरा किया। कुलपति डॉ. बलराज सिंह की अध्यक्षता में कार्यक्रम हुआ। महाविद्यालय के 11 विभाग के 122 छात्रों ने मधुमक्खी पालन की राजस्थान में संभावनाओं‌ व चुनौतियों पर विस्तार से मंथन किया। वक्ताओं ने कहा कि- मधुमक्खी पालन से शहद उत्पादन, मधुमक्खी मोम, रॉयल जेली, प्रोपोलिस आदि प्राप्त होते हैं। मधुमक्खी पालन का औषधीय और व्यावसायिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मूल्य है। कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, प्रोटीन, खनिजों का स्रोत और पर्याप्त औषधीय मूल्य होने के कारण, शहद की बढ़ती खपत ने किसानों के लिए मधुमक्खी पालक बनने का अवसर पैदा किया है। Bee Keeping

    डॉ. बलराज सिंह ने कहा कि मधुमक्खी पालन सिर्फ शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि उत्पादकता बढ़ाने, जैव विविधता संरक्षण और मानव स्वास्थ्य में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। उन्होंने कहा, “मधुमक्खियां परागण की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाती हैं, जिससे फसलों का उत्पादन बढ़ता है। “सरसों, राई और अन्य फूलदार फसलों के लिए मधुमक्खियां परागण में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने मधुमक्खी के डंक के औषधीय गुणों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि एपीथेरेपी नामक एक पद्धति में मधुमक्खी के डंक का उपयोग दर्द, आर्थराइटिस, सूजन, और अन्य समस्याओं के इलाज में किया जाता है। यह एक प्राकृतिक और सुरक्षित उपचार का विकल्प हो सकता है।

    उन्होंने कहा-मधुमक्खियों की आजीविका तापमान से बहुत प्रभावित होती है। 13 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर और 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचने पर मधुमक्खियों की कार्यक्षमता कम हो जाती है और वे उड़ नहीं पाती हैं। राजस्थान का अर्ध-शुष्क क्षेत्र मधुमक्खी पालन के लिए काफी उपयुक्त है क्योंकि यहां सर्दियों और गर्मियों के मौसम के अधिकांश दिनों में तापमान अनुकूल रहता है जिसके कारण इसका पालन संभव है।

    शहद का उपयोग | Bee Keeping

    एक प्राकृतिक स्वीटनर होने और लगभग 80% कार्बोहाइड्रेट होने के कारण, शहद का उपयोग बेकरी, कन्फेक्शनरी और पेय उद्योगों में किया जा सकता है। यह न केवल खाद्य पदार्थों में स्वाद जोड़ता है बल्कि यह उच्च ऊर्जा कार्बोहाइड्रेट का स्रोत है और आसानी से पचने योग्य है। इसे टेबल शहद के रूप में सेवन किया जा सकता है या कैंडी, केक, पके हुए खाद्य पदार्थों और जूस में एक घटक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। शहद में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो कई बीमारियों के इलाज में मददगार साबित हो सकते हैं। शहद प्राकृतिक रूप से स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है और इसका नियमित सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक होता है।

    विश्वविद्यालय तैयार करेगा एडवाइजरी एप्स

    कुलपति डॉ. बलराज सिंह ने बताया कि विश्वविद्यालय मधुमक्खी पालकों के लिए जल्द ही एक एडवाइजरी एप्स लॉन्च करेगा। इस एप्स के माध्यम से मधुमक्खी पालन से संबंधित सभी जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। “इस ऐप में मधुमक्खी पालन की उन्नत तकनीकों व बीमारियों के नियंत्रण संबंधित जानकारी मिलेगी। साथ ही यह मोबाइल एप्स किसानों को मधुमक्खी पालन को और अधिक लाभदायक बनाने में मदद करेगा।

    15 जिलों में मधुमक्खी पालन की संभावनाएं | Bee Keeping

    विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले 15 जिलों में मधुमक्खी पालन की अपार संभावना देखी हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में रेपसीड और सरसों का उत्पादन अधिक होता है। सरसों में मधुमक्खियां 20-25 % तक उपज में वृद्धि करती है। राजस्थान में मधुमक्खी पालन केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग जैविक खेती, औषधीय उत्पादों और सौंदर्य प्रसाधनों में बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत में लगभग 2.5 लाख मधुमक्खी कॉलोनियां हैं, जबकि देश की क्षमता 200 लाख कॉलोनियों तक की है। यह दर्शाता है कि मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में अपार संभावनाएं मौजूद हैं। इस दौरान डॉ. आईएम खान, डॉ. केसी शर्मा, डॉ. शैलेश गोदिका, डॉ. आरएन शर्मा, डॉ. बीएस बधाला, डॉ. राजेश सिंह, डॉ. संतोष देवी सामोता, डॉ. हीना सहीवाला मौजूद रहे। Bee Keeping

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