‘‘बेटा, परवाह न कर ! मालिक खुशियां बख्शेगा।’’

Parm-Pita-ji sachkahoon

17जनवरी 1976 गांव महमा सरजा (पंजाब) में सत्संग था। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज (God) शाम के समय अधिकांशत: बाहर खेतों में घूमने जाया करते। वहां गुरबचन सिंह फौजी नाम का एक व्यक्ति था, जिसका घर गांव से बाहर था। उसने सोचा कि काश! उसका घर भी पक्का और सुंदर होता तो वह पूजनीय परम पिता जी से अपने घर पर चरण टिकाने की प्रार्थना करा सकता।

पूजनीय परम पिता जी घूमने के लिए खेतों की तरफ जा रहे थे। जैसे ही उस फौजी भाई का घर आया तो पूजनीय परम पिता जी उसके घर जाकर वहां पर रखे एक मूढ़े पर जा बैठे। फौजी की आंखों से प्रेम व खुशी के आंसू बहने लगे। उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। पूजनीय परम पिता जी ने उसकी सच्ची तड़प को पूरा किया तथा स्वयं कहकर उससे चाय बनवाई।

पूजनीय पिता जी (God) ने वचन फरमाए, ‘‘परवाह न कर! मालिक खुशियां बख्शेगा।’’ उस इन्सान पर प्यारे मुर्शिद दातार जी ने इतनी रहमत की कि उस फौजी के चार पुत्र सरकारी नौकरी पर हैं। सारा परिवार साध-संगत की सेवा में बढ़-चढ़ कर भाग लेता है। पूजनीय परम पिता जी ने पावन वचनों द्वारा उसकी निर्धनता दूर कर उसे खुशहाली बख्श दी।

उन्हीं दिनों राजस्थान के एक गांव में रात का सत्संग था। पूजनीय परम पिता जी सत्संग से पहले शाम को बाहर खेतों में सैर करने के लिए निकले। शहनशाह जी एक ऊंचे टीले पर जाकर विराजमान हो गए। दलीप सिंह रागी को कोई भजन सुनाने का हुक्म फरमाया। धीरे-धीरे साध-संगत भी आ गई। अभी भजन चल ही रहे थे कि एक सेवादार ने देखा कि पश्चिम की तरफ से बहुत ही जबरदस्त तूफान उठा है और साध-संगत की तरफ आ रहा है।

एक सेवादार ने पूजनीय परम पिता जी (God) के पास जाकर अर्ज की कि ‘‘शहनशाह जी, बहुत ही जबरदस्त तूफान आ रहा है।’’ इस पर पूजनीय परम पिताजी ने कोई ध्यान नहीं दिया। जब उस सेवादार को लगा कि यह तो बिल्कुल ही नजदीक आ गया है तो उससे रहा नहीं गया और उसने फिर दोबारा हाथ जोड़कर शहनशाह जी के पावन चरण कमलों में विनती की, ‘‘शहनशाह जी! ये तो बिल्कुल ही पास आ गया है।’’

पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘ठीक है, चलो भाई!’’ इस प्रकार साध-संगत को आज्ञा प्रदान कर शहनशाह जी रात्रि विश्राम वाली जगह पर आ गए। सीढ़ियां चढ़ते हुए जब पूजनीय परम पिता जी विश्राम स्थल की ओर ऊपर जा रहे थे तो वचन फरमाया, ‘‘बे-मौसम बादल कहां से आ गया।’’ इसके बाद जब सेवादार ने मुड़कर देखा तो मीलों तक तूफान का कोई नामो निशान नहीं था।

प्यारे सतगुरू जी ने न जाने उसे कहां खत्म कर दिया। जबकि उस समय ऐसा स्पष्ट दिखाई दे रहा था कि यह तूफान तो सभी को अपनी चपेट में ले लेगा, लेकिन वहां तो हवा का तेज झोंका भी नहीं आया। मालिक ने वो आंधी तूफान पल में ही कहीं और टालकर साध-संगत की स्वयं रक्षा की।

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