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    ओडिशा में तितली का तांडव

    Butterfly of Orissa in Odisha

    मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और आपदा प्रबंधन के समन्वित प्रयासों के बावजूद तूफान तितली के तांडव से 16 लाख लोग प्रभावित हो गए हैं। भारी बारिश के चलते ज्यादातर नदियों ने अपने किनारे लांघकर करीब 15 जिलों की आबादी पर कहर बरपा दिया है। आठ लोगों की मौत के बाद गंजाम जिले की ग्राम पंचायत भूतांपकल के छह लोग लापता हैं। ओडिशा में रुशिकुल्या बनासधारा और आंध्र प्रदेश की महेंद्रतान्या नदियां उफान पर हैं। समुद्रतटीय रेल पटरियां पानी में डूब जाने के कारण 16 रेलों को रद्द करना पड़ा है। यदि मौसम विभाग द्वारा सटीक भविष्यवाणी नहीं कि गई होती तो इस चक्रवात से बड़ी जन एवं माल हानि उठानी पड़ती।

    इस परिप्रेक्ष्य में हमारी तमाम एजेंसियों ने आपदा से कुशलतापूर्वक सामना करके एक भरोसेमंद मिसाल पेश की है, जो सराहनीय व अनुकरणीय है। ओड़ीशा और आंध्रप्रदेश के तटीय इलाकों के लोग तूफान की खबर मिलने के बाद से ही सहमे हुए थे, क्योंकि तूफानी हवाएं 80 से 120 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने को अंगड़ाई ले रही थी। दरअसल बंगाल की खाड़ी के ऊपर बने गहरे दबाव का क्षेत्र तीव्र होकर चक्रवाती तूफान तितली में बदल गया था। तितली ओडिशा में गोपालपुर से यही 530 किमी दक्षिण पूर्व में और आंध्र प्रदेश में कलिंगपट्नम से 480 किमी पूर्व दक्षिण पूर्व में केंद्रित था। इसके उठने का अनुमान लगाकर मौसम विभाग ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कई स्थानों पर भयंकर बारिश और तेज हवाएं चलने की आशंकाएं जताई थी। इस तूफान तितली ने उड़ान भरी तो 126 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से यह ओडिशा और आंध्र प्रदेश के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में भी तांडव मचा गया। इससे आंध्र में 8 और ओडिशा में दो लोगों की मौत हुई। मौसम विभाग की भविष्यवाणी के चलते ओडिशा व आंध्र के समुद्री तटों से तीन लाख से भी ज्यादा लोगों को तूफान आने से पहले सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया था, बावजूद 13 लाख अन्य लोग तितली तूफान से प्रभावित हुए हैं।

    भारतीय मौसम विभाग के अनुमान अकसर सही साबित नहीं होते, इसलिए उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन फेलिन, हुदहुद और तितली चक्रवात से जुड़ी उसकी भविष्यवाणी सटीक बैठी हैं। इन अवसरों पर हमारे मौसम विज्ञानी सुपर कंप्यूटर और डॉपलर राडार जैसी श्रेष्ठतम तकनीक के माध्यमों से चक्रवात के अनुमानित और वास्तविक रास्ते का मानचित्र एवं उसके भिन्न क्षेत्रों में प्रभाव के चित्र बनाने में भी सफल रहे हैं। तूफान की तीव्रता, हवा की गति और बारिश के अनुमान भी कमोबेश सही साबित हुए। इन अनुमानों को और कारगर बनाने की जरुरत है, जिससे बाढ़, सूखे, भूकंप और बवंडरों की पूर्व सूचनाएं मिल सकें और इनसे सामना किया जा सके। साथ ही मौसम विभाग को ऐसी निगरानी प्रणालियां भी विकसित करने की जरुरत है, जिनके मार्फत हर माह और हफ्ते में बरसात होने की राज्य व जिलेबार भविष्यवाणियां की जा सकें। यदि ऐसा मुमकिन हो पाता है तो कृषि का बेहतर नियोजन संभव हो सकेगा। साथ ही अतिवृष्टि या अनावृष्टि के संभावित परिणामों से कारगर ढंग से निपटा जा सकेगा। किसान भी बारिश के अनुपात में फसलें बोने लग जाएंगे। लिहाजा कम या ज्यादा बारिश का नुकसान उठाने से किसान मुक्त हो जाएंगे। मौसम संबंधी उपकरणों के गुणवत्त्ता व दूरंदेशी होने की इसलिए भी जरुरत है, क्योंकि जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से समुद्रतटीय इलाकों में आबादी भी ज्यादा है और वे आजीविका के लिए समुद्री जीवों पर निर्भर हैं। लिहाजा समुद्री तूफानों का सबसे ज्यादा संकट इसी आबादी को झेलना पड़ता है।

    यही कारण था कि 1999 में जब उड़ीसा में नीलम (फैलिन) तूफान आया था तो हजारों लोग सटीक भविष्यवाणी न होने और आपदा प्रबंधन की कमी के चलते मारे गए थे। 12 अक्टूबर 2013 को उष्णकटिबंधीय चक्रवात फैलिन ने ओडिशा तट पर दस्तक दी थी। अंडमान सागर में कम दबाव के क्षेत्र के रूप में उत्पन्न हुए फैलिन ने 9 अक्टूबर को उत्तरी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पार करते ही एक चक्रवाती तूफान का रूप ले लिया था। इसने सबसे ज्यादा नुकसान ओडिशा और आंध्र प्रदेश में किया था। इस चक्रवात की भीशणता को देखते हुए 6 लाख लोग सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाएं गए थे। तूफान का केंद्र रहे गोपालपुर से तूफानी हवाएं 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से गुजरी थी। 2004 में आए सुनामी तूफान का असर सबसे ज्यादा इन्हीं इलाकों में देखा गया था। हालांकि हिंद महासागर से उठे इस तूफान से 14 देश प्रभावित हुए थे। तमिलनाडू में भी इसका असर देखने में आया था। इससे मरने वालों की संख्या करीब 2 लाख 30,000 थी। भारत के इतिहास में इसे एक बड़ी प्राकृतिक आपदा के रूप में देखा जाता है। 8 और 12 अक्टूबर 2014 में आंध्र एवं ओडिशा में हुदहुद तूफान ने भी भयंकर कहर बरपाया था। इसकी दस्तक से इन दोनों राज्यों के लोग सहम गए थे। भारतीय नौसेना एनडीआरएफ ने करीब 4 लाख लोगों को सुरक्षित क्षेत्रों में पहुंचाकर उनके प्राणों की रक्षा की थी। इसलिए इसकी चपेट से केवल छह लोगों की ही मौंते हुई। हालांकि आंध्र प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही 1839 में आए कोरिंगा तूफान ने मचाई थी। गोदावरी जिले के कोरिंगा घाट पर समुद्र की 40 फीट ऊंचीं उठी लहरों ने करीब 3 लाख लोगों को निगल लिया था। समुद्र में खड़े 20,000 जहाज कहां विलीन हुए पता ही नहीं चला। उससे पहले1789 में भी कोरिंगा से एक और समुद्री तूफान टकराया था, जिसमें लगभग 20,000 लोग मारे गए थे।

    कुदरत के रहस्यों की ज्यादातर जानकारी अभी अधूरी है। जाहिर है, चक्रवात जैसी आपदाओं को हम रोक नहीं सकते, लेकिन उनका सामना या उनके असर कम करने की दिशा में बहुत कुछ कर सकते हैं। भारत के तो तमाम इलाके वैसे भी बाढ़, सूखा, भूकंप और तूफानों के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित होते जा रहे पर्यावरण के कारण ये खतरे और इनकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। कहा भी जा रहा है कि फेलिन, ठाणे, आइला, आईरिन, नीलम और सैंडी जैसी आपदाएं प्रकृति की बजाय आधुनिक मनुष्य और उसकी प्रकृति विरोधी विकास नीति का पर्याय हैं। इस बाबत गौरतलब है कि 2005 में कैटरीना तूफान के समय अमेरिकी मौसम विभाग ने इस प्रकार के प्रलयंकारी समुद्री तूफान 2080 तक आने की आशंका जताई थी, लेकिन वह सैंडी और नीलम तूफानों के रुप में 2012 में ही आ धमके। 17 साल पहले ओडिशा में सुनामी से फूटी तबाही के बाद पर्यावरणविदों ने यह तथ्य रेखांकित किया था कि अगर मैग्रोंव वन बचे रहते तो तबाही कम होती। ओडिशा के तटवर्ती शहर जगतसिंहपुर में एक औद्योगिक परियोजना खड़ी करने के लिए एक लाख 70 हजार से भी ज्यादा मैंग्रोव वृक्ष काट डाले गए थे। दरअसल, जंगल एवं पहाड़ प्राणी जगत के लिए सुरक्षा कवच हैं, इनके विनाश को यदि नीतियों में बदलाव लाकर नहीं रोका गया तो तय है कि आपदाओं के सिलसिलों को भी रोक पाना मुश्किल होगा ? लिहाजा नदियों के किनारे अवासीय बस्तियों पर रोक और समुद्र तटीय इलाकों में मैंग्रोव के जंगलों का सरंक्षण जरूरी है।

    दरअसल कार्बन फैलाने वाली विकास नीतियों को बढ़ावा देने के कारण धरती के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि बीते 134 सालों में रिकार्ड किए गए तापमान के जो 13 सबसे गर्म वर्ष रहे हैं, वे वर्ष 2000 के बाद के ही हैं और आपदाओं की आवृत्ति भी इसी कालखण्ड में सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। पिछले तीन दशकों में गर्म हवाओं का मिजाज तेजस्वी लपटों में बदला है। इसने धरती के 10 फीसदी हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया है। बताया जा रहा है कि वैष्विक तापवृद्धि के चलते समुद्री तल खौल रहा है। फ्लोरिडा से कनाडा तक फैली अटंलांटिक की 800 किमी चौड़ी पट्टी में समुद्री तल का तापमान औसत से तीन डिग्री सेल्सियस अर्थात 5.4 फारेनहाइट ज्यादा है। यही उर्जा जब सतह से उठ रही भाप के साथ मिलती है तो समुद्री तल में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव शुरु हो जाता है, जो चक्रवाती बंवडर को विकसित करता है। इस बवंडर के वायुमंडल में विलय होने के साथ ही, वायुमंडल की नमी 7 फीसदी बढ़ जाती है, जो तूफानी हवाओं को जन्म देती है। प्राकृतिक तत्वों की यही बेमेल रासायनिक क्रिया भारी बारिश का आधार बनती है, नतीजतन तबाही के परचम से धरती कांप उठती है।

    तापमान की इसी वृद्धि का अनुमान लगा लिए जाने के आधार पर अंतर सरकारी पेनल ने भी भारतीय समुद्री इलाकों में चक्रवाती तूफानों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई है। इस लिहाज से हमारी संस्थाओं की जो समवेत जवाबदेही, इस चक्रवात से सामना करने में दिखाई दी, उसकी निरंतरता बनी रहनी चाहिए। मौसम विभाग की भविष्यवाणी के बाद बचाव और राहत की तैयारी के लिए महज तीन दिन मिले थे। इन्हीं तीन दिनों में केंद्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण सक्रिय हो गया। इसकी हिदायतों के मुताबिक थल, जल और वायु सेनाएं जरुरी संसाधनों के साथ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात हो गईं। ओड़िशा और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने भी वक्त के तकाजे के हिसाब से बचाव के सभी संसाधन तटवर्ती क्षेत्र में झोंक दिए। मीडिया भी मैदान में तैनात होकर आगे बढ़ते तूफान की सूचनाएं देकर जनता को सुरक्षित स्थलों पर पहुंचने की मुनादी पीटता रहा। इस संकट की घड़ी में जो साझा दायित्व बोध देखने में आया, वह यदि भविष्य में भी बना रहता है तो भारत ऐसी अचानक आने वाली आपदाओं से मानव आबादी को सुरक्षित बनाए रखने में सफल बना रहेगा। प्रमोद भार्गव

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