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Thursday, March 5, 2026
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    Home विचार सम्पादकीय सोच को बदलें ...

    सोच को बदलें देश बदल जाएगा

    Change, Thought, Change, Country

    अभी जुम्मा-जुम्मा वंदे भारत रेल का शुभमुहुर्त हुआ है, लेकिन देश के कुछ लोगों ने उस पर भी पत्थर मारने शुरु कर दिए हैं पिछले दशकों में भारतीय रेलवे में बहुत विकास हुआ है। हर सरकार ने अपने वक्त में रेलवे में नया जोड़ा है। अभी ‘वंदे भारत’ रेल की शुरूआत से देश में तेज गति एवं अत्याधुनिक कोच व सेवाएं रेलवे में शुरू हो गई, जो कि देशवासियों की बहुत समय से मांग थी। देश का रेलवे ढांचा काफी चुस्त-दुरुस्त व सुरक्षित हुआ है। भारतीय रेलवे दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे तंत्र है।

    लेकिन रेलवे के साथ एक त्रासदी भी जुड़ी है वह यह कि भारतीय लोग इसके साथ बहुत बुरा सुलूक करते हैं। सरकार के साथ लोगों का छोटा-बड़ा जो भी झगड़ा हो सबसे पहले रेलवे को शिकार बनाया जाता है। तोड़-फोड़ यातायात में बाधा लोगों के लिए आम बात है परंतु रेलवे को इसका बहुत नुक्सान उठाना पड़ता है। जो कि किसी न किसी रूप में देशवासियों का अपना ही नुक्सान है। हर देशवासी भले वह ग्रामीण है या शहरी, पढ़ा है या अनपढ़ वह टिकट खरीदकर रेलवे से विश्वस्तरीय सुविधाओं की मांग करता है, लेकिन यात्रा के बाद रेलवे के तौलिए, टायलेट के मग, चदरें, आईने, बल्ब चोरी कर ले जाता है, ऐसा क्यों? लोग पहले रेलवे को नुक्सान पहुंचाते हैं फिर मजाक उड़ाते है, आखिर यह मजाक है किसका स्वयं देशवासियों का ही तो मजाक बनता है। यहां ‘वंदे भारत’ को बनाया, चलाया देश ने हैं, अत: देश इसको सुरक्षित भी रखे अच्छा भी रखे।

    पढ़ने वालों को मेरी बात भले रेलवे की अपील लगे लेकिन यह एक देशवासी का देश की सम्पति को लेकर फिक्र है, जो कि सबके हिस्से आना चाहिए। देशवासियों की गैर जिम्मेदाराना हरकतों का भ्रष्ट लोग भरपूर लाभ उठाते हैं, वह अपने कामों की गलतियों को भी देशवासियों पर थोप देते हैं, वहीं वह वास्तविक नुक्सान को बढ़ा-चढ़ा कर देश व रेलवे दोनों का धन भी ऐठते हैं। कितना अच्छा हो यदि देशवासी सरकारी सेवाओं का अपनी निजी सम्पति की तरह फिक्र करें और उनका भरपूर सद्पयोग करें।

    सरकारी अस्पताल, बस सेवा, सड़कें, फुटपाथ, पार्क, स्ट्रीट लाईटें, ऐसी अनेकों सेवाएं हैं, जिन्हें पब्लिक बेमतलब तोड़ती रहती है, जबकि यह सारी सेवाएं व सम्पति देश की पीढ़ियों को संवार सकती हैं। यह कितना दुखद है कि देश का शिक्षित, समझदार युवा, प्रौढ़, महिला-पुरुष विदेशों में काम करके उन्हें अच्छा बताता है जबकि खुद के घर को कूड़ा-कबाड़ा रखता है, तोड़-फोड़ करता है फिर बुरा बताता है। फर्क सिर्फ सोच का है देश वही हैं लोग वही है जो विदेशों को स्वर्ग बना रहे है और अपना घर वह बेहाल करके खुश होते हैं।

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