बच्चों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता को रोका जाए

(सच कहूँ न्यूज)। बच्चों के प्रति समाज को जितना संवेदनशील होना चाहिए, उतना हो नहीं पाया है। कैसा विरोधाभास है कि हमारा समाज, सरकार और राजनीतिज्ञ बच्चों को देश का भविष्य मानते नहीं थकते फिर भी उनकी बाल-सुलभ संवेदनाओं को कुचला जाना लगातार जारी है। बच्चों के प्रति संवेदनहीनता को सिर्फ जघन्य अपराधों में ही नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि कई ऐसे मौके हैं, जब समाज के संवेदनहीन व्यवहार का हमें अहसास भी नहीं होता, वैसा व्यवहार लगातार बच्चों के साथ होता रहता है।

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सोशल मीडिया पर बच्चों के बारे में की गई टिप्पणियों के आईने में समाज को अपना चेहरा देखना चाहिए। क्यों हम नन्हें बच्चों को अपनी विकृत मानसिकता एवं वीभत्स सोच का शिकार बनाते हैं? ऐसी ही एक त्रासद एवं विडंबनापूर्ण घटना ने एक बार फिर बच्चों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता को दर्शाया है। मामला क्रिकेट जगत की दो हस्तियों महेंद्र सिंह धोनी और विराट कोहली की बेटियों पर की गई अभद्र एवं अश्लील टिप्पणियों का है। इस तरह की शर्मनाक घटना की जितनी भर्त्सना की जाए कम है। इस मामले में दिल्ली पुलिस को कार्रवाई के लिए भी लिखा गया है।

यहां प्रश्न कार्रवाई का नहीं है, प्रश्न है कि ऐसी विकृत सोच क्यों पनप रही है? प्रश्न यह भी है कि हम खेल को खेल की तरह देखना कब सीखेंगे? प्रश्न यह भी है कि ऐसी घटनाओं पर स्थायी नियंत्रण के लिए सरकार क्या व्यवस्था कर रही है? क्योंकि यह देश के करीब 30 करोड़ बच्चों से जुड़ा ऐसा मामला है जिसे समय पर काबू में नहीं किया गया तो तैयार होने वाले बच्चों में विकृतियां एवं विद्रूपताएं घर कर लेंगी। एक बीमार पीढ़ी का निर्माण होना तय है। विडंबना यह भी है कि सरकारी एजेंसियों की सख्ती भी काम नहीं आ रही है और लगातार ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। हालांकि अक्सर हम इसे नजरअंदाज कर देते हैं। मामला तभी तूल पकड़ता है, जब किसी सेलिब्रिटी के साथ ऐसी घटना हो जाए।

प्रश्न है कि हमेशा की तरह ऐसे आदेश ‘वही ढाक के तीन पात’ साबित नहीं हो जाएं, इसकी पुख्ता व्यवस्था होना ज्यादा जरूरी है। कुछ लोग 2 और 7 साल की बच्चियों के विषय में ऐसी घटिया, अभद्र, अश्लील एवं शर्मनाक बातें कर रहे हैं, जो इन अबोध बच्चों के साथ-साथ करोड़ों बच्चों के मानस पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालती है एव ंहम सबके माथे पर शर्म का धब्बा लगाती हैं। यदि कोई खिलाड़ी पसंद नहीं है, तो क्या उसके बच्चों को गाली दी जाएगी।

क्रिकेट टीम का कोई भी मैच हारने के बाद निराश क्रिकेट प्रशंसकों द्वारा खिलाड़ियों को ट्रोल करना कोई नया नहीं है, लेकिन ट्रोलर्स कई बार खिलाड़ियों के परिवार वालों को गालियां तक देने लगते हैं और अब तो बच्चों तक को अपने आक्रोश का निशाना बनाने लगे हैं। बता दें कि इससे पहले भी साल 2020 में एक इंस्टाग्राम यूजर ने एमएस धोनी की पांच साल की बेटी जीवा को रेप की धमकी दी थी। नन्हीं बेटियों पर पहले भी ऐसे भद्दे कमेंट किए जा चुके हैं। किसी के खिलाफ भी ऐसी कार्रवाई नहीं हुई है, जिसे सबक माना जाए।

सोशल मीडिया पर टिप्पणियों से इतर कई अन्य मौकों पर भी हम बच्चों के प्रति असामान्य व्यवहार की झलक देख सकते हैं। जैसे बच्चों के खिलौनों को ही लें। कभी ऐसे खिलौने मिट्टी और काठ के बनते थे। उन पर रंग भी ऐसे लगाए जाते थे जिनसे बच्चों को कोई नुकसान न हो, बल्कि उन पर सकारात्मक असर करें। लेकिन विडम्बना देखिए कि ज्यादा से ज्यादा मुनाफाखोरी एवं बाजारवादी सोच की प्रवृत्ति ने बच्चों को भी नहीं बख्शा है। ऐसे खिलौनों के बाजार का तेजी से विकास हुआ है, जिनसे बच्चों के स्वास्थ्य, उनकी सोच एवं संस्कारों पर वितरीत प्रभाव पड़ता है और भारत का बचपन इन खिलौनों के कारण अपने स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहा है। हानिकारक खिलौनों को बाजार से हटाने के लिए सरकार ने नियम बना दिए हैं, फिर भी वे धड़ल्ले से बेचे जा रहे हैं।

ई-कॉमर्स के वर्तमान दौर में तो ऐसे खिलौनों के लिए बाजार जाने की भी जरूरत नहीं है। मोबाइल के एक क्लिक पर ऐसे हानिकारक खिलौने घर पर ही पहुंच जाते हैं। भारतीय मानक ब्यूरो ने एक जनवरी 2021 से ही निर्दिष्ट सुरक्षा मानदंडों को अनिवार्य कर दिया है, लेकिन इनका पालन नहीं करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नगण्य है। हालांकि, पिछले एक महीने में गुणवत्ता का पालन न करने वाले खिलौना कारोबारियों पर सरकार कार्रवाई कर रही है। ऐसी कार्रवाइयां लगातार होनी चाहिए और सुरक्षा मानदंडों के उल्लंघन पर कारोबारियों के लाइसेंस हमेशा के लिए जब्त किए जाने चाहिए। बच्चों के प्रति बढ़ती संवेदनहीनता के खिलौनों एवं अभद्र टिप्पणियों के अलावा और भी डरावने दृश्य हैं, जो विचलित भी करते हैं एवं दु:ख पहुंचाते हैं।

मासूम मन पर हो रहे इन हमलों के कारण हम ऐसा समाज निर्मित कर रहे हैं, जिसमें हिंसा, अराजकता, अश्लीलता व्याप्त है। बच्चों के स्वभाव में चिड़चिड़ापन एवं अपसंस्कार शामिल हो रहा है। अमेरिका सहित पश्चिम के कई देशों में तो यह भी हुआ है कि किसी बात पर परस्पर झगड़ा होने पर बच्चा हथियार लेकर स्कूल पहुंच गया। कुछ घटनाएं दुर्याेग या तात्कालिक परिस्थितियों का परिणाम हो सकती हैं, लेकिन दुनिया भर के बच्चों के स्वभाव में बढ़ता चिड़चिड़ापन और उग्रता निश्चित रूप से हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। बांह पसार कर अपने आत्मियों से मिलने को आतुर बचपन अपने समाज एवं घर के आसपास ही अनेक संकटों का सामना कर रहा है। महानगरों में तो कामकाजी माता-पिताओं के बच्चे क्रेच या घरेलू बाइयों के भरोसे होते हैं और इनके बुरे बर्ताव की खबरें आए दिन टेलीविजन के माध्यम से सामने आती रहती हैं।

कुछ समय पहले एक चैनल पर खबर थी, जहां परिवार द्वारा बच्ची की देखरेख के लिए रखी गई स्त्री ने दिन में बच्ची के रोने से अपनी नींद में खलल पड़ने पर उस मासूम को इतनी बुरी तरह से उठा कर सोफे पर फेंका कि खबर देखने वालों की आत्मा सिहर गई। जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों के संवेदनशील मन की जरूरतों को समझें और इससे पहले कि उनका अकेलापन किसी उग्रता या उद्दंडता से ग्रसित हो, प्रेम की एक जादू भरी झप्पी के साथ उन्हें संस्कारित करें, क्योंकि बच्चों के प्रति निभाया गया यह दायित्व ही हमारे भविष्य को सुनहरा करेगा। बच्चों के प्रति संवेदनहीनता बरतने की बजाए उनके बीच स्नेह, आत्मीयता और विश्वास का भरा-पूरा वातावरण पैदा किया जाए। सरकार को बच्चों से जुड़े कानूनों पर पुनर्विचार करना चाहिए एवं बच्चों के प्रति घटने वाली संवेदनहीनता की घटनाओं पर रोक लगाने की व्यवस्था की जानी चाहिए।

कुछ दिनों पहले यह सनसनीखेज बात भी सामने आई कि नर्मदा किनारे बसे कुछ गांवों में बेटियों को जन्म के तुरंत बाद जीवित जलसमाधि दे दी जाती है। बेटों की इच्छा में गर्भ में पल रही बेटियों को चोरी-छिपे मारे जाने की घटनाएं भी सख्त कानूनों के बावजूद आम हैं, लेकिन जन्म ले चुकी बेटी को जीवित जलसमाधि दे देना क्रूरता के नए किस्से कहता है। मगर मासूम बच्चे केवल अंधविश्वासों के शिकार नहीं होते। सयानों के लालच, परस्पर प्रपंच और संपत्ति के लिए किए जाने वाले षड्यंत्र भी उन्हें अपना शिकार बनाते हैं। पिछले साल आई एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन देश में नौ सौ से अधिक बच्चे यौन अपराधों के शिकार होते हैं।

                                                                              ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार

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