हमसे जुड़े

Follow us

26 C
Chandigarh
Thursday, March 26, 2026
More
    Home विचार सम्पादकीय टकराव में बदल...

    टकराव में बदलता विरोध

    Collision turned into protest
    केन्द्रीय नागरिकता शोध कानून के खिलाफ पिछले 70 दिनों से चल रहा विरोध-प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर रहा है। विगत दो दिनों में देश की राजधानी में तोड़फोड़ व आगजनी हुई व एक पुलिस कर्मचारी की जान भी चली गई। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि प्रदर्शनकारियों का पुलिस झड़प से भी मामला आगे निकल गया है। अब कानून के समर्थक व विरोधी ही आपस में टकरा रहे हैं।
    नि:संदेह ऐसे टकराव हमारे देश, संविधान व समाज के लिए खतरनाक परिस्थितियां पैदा कर रहे हैं। विरोध का तरीका संवैधानिक, सद्भावना भरा व तर्कसंगत होना चाहिए। सड़कें जाम करना व लोगों को परेशान करने को धरना नहीं कहा जा सकता। महात्मा गांधी के आंदोलन की मिसाल हम सभी के सामने है। देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करवाने के लिए महात्मा गांधी ने शांतिमय अहिंसक आंदोलन शुरू किया था, जो पूर्णत: सफल रहा। आज दुनिया के छोटे-बड़े देश गांधी जी की विचारधारा को अपना रहे हैं। अमेरिका सहित यूरोपीय व अफ्रीकी देशों ने महात्मा गांधी के नाम पर गलियों-चौकों के नाम रखे हैं। वहां उनकी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।
    नि:संदेह एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी कानून से किसी भी वर्ग को असहमति हो सकती है व उस वर्ग को विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन विरोध के नाम पर हिंसा फैलाना सही नहीं है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन में प्रसिद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे ने सड़क के एक तरफ बैठकर धरना दिया था व यूपीए सरकार को हिला दिया था। यहां गलती महज प्रदर्शनकारियों की ही नहीं बल्कि कानून के सर्मथकों का गैर-जरूरी उत्साह एवं उनकी भड़काहट स्थिति को बिगाड़ रही है। सत्तापक्ष व पुलिस पर सर्मथकों के हुड़दंग को शह देने के आरोप लगे रहे हैं।
    दरअसल इस विरोध को बिगाड़ने का काम कुछ बड़बोले नेता भी कर रहे हैं जो अपने नफरत भरे भाषणों द्वारा अपने-अपने वर्ग के लोगों को भड़का रहे हैं, नहीं तो टकराव जैसी स्थिति पैदा ही क्यो हो? प्रदर्शनकारी अपनी बात रखें, उनका विरोध सरकार से है, लेकिन जब यहां कानून के समर्थक क्यों ठेकेदार बन रहे है? अच्छा हो अगर राजनीतिक पार्टियां अपने नेताओं व कार्यकत्ताओं को संयम में रहने की नसीहत दें। अगर कोई नहीं मान रहा तब उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाएं। लेकिन हिंसा का मौन समर्थन नहीं हो।  कोई भी राजनीतिक पक्ष देश का मालिक नहीं व न ही जज है । जनता ही असली जज है। जनता दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है, सीएए कानून की परख जनता की कचहरी में होनी चाहिए। अगला आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं।

    अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।