भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए बनें ठोस व्यवस्था

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इन दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी-बड़ी कार्रवाईयां हो रही हैं। ईडी, विजीलेंस और पुलिस की गतिविधियां सुर्खियों में है। कहीं ईडी की छापेमारी तो कहीं विजीलेंस की रेड हो रही हैं। महाराष्टÑ के शिवसेना नेता संजय राउत को ईडी ने पूछताछ के लिए समन जारी किए हैं। भ्रष्टाचार के आरोप में आईएएस आॅफिसर संजय पोपली व पंजाब के अमृतसर में विजीलेंस टीम ने ड्रग इंस्पेक्टर बवलीन को एक लाख रुपये रिश्वत के मामले में गिरफ्तार किया है। इन परिस्थितियों में आम व्यक्ति इसीलिए हैरान है कि भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं। अब हर ईमानदार व्यक्ति यही सोच रहा है कि जनता के चुने नुमाइंदे ही इतनी लूट मचा रहे हैं।

भ्रष्टाचार में लिप्त राजनेताओं व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई आवश्यक है लेकिन यह सब कुछ केवल गिरफ्तारियों व सजा दिलवाने तक सीमित न रहे बल्कि सिस्टम में सुधार का ऐसा नया मॉडल स्थापित करना होगा कि कोई रिश्वत ही ना ले सके। यह भी वास्तविक्ता है कि गिरफ्तारियां व कानूनी कार्रवाई तो अवश्य होती है लेकिन बावजूद इसके भ्रष्टाचार नहीं रूका। जनता की भी जिम्मेवारी बनती है कि वे रिश्वत मांगने वालों का विरोध करें। जब कोई भी सरकारी काम बिना रूकावट के हो रहा है तब लोग जल्दबाजी व पहले काम करवाने के चक्कर में अफसरों को रिश्वत दे देते हैं। बहुत कम लोग रिश्वत न देने के लिए संघर्ष करते हैं, अधिकतर लोगों यही सोचते हैं कि पैसे देकर अपना काम करवाओ।

यदि नये भारत-सशक्त भारत को निर्मित करना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े और सख्त कदम तो उठाने ही होंगे और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को तेज करते हुए वोहरा कमेटी की सिफारिशों को अंजाम तक पहुंचाना ही होगा। वास्तव में कुछ हासिल करना है, तो फिर नेताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले जल्द निपटाने की कोई ठोस व्यवस्था बनानी होगी। इसका कोई औचित्य नहीं कि जिन मामलों का निपटारा प्राथमिकता के आधार पर होना चाहिए, वे वर्षों और कभी-कभी तो दशकों तक खिंचते रहें। राजनीति के शीर्ष पर जो व्यक्ति बैठता है उसकी दृष्टि जन पर होनी चाहिए पार्टी पर नहीं।

आज जन एवं राष्ट्रहित पीछे छूट गया और स्वार्थ आगे आ गया है। जिन राजनीतिक दलों को जनता के हितों की रक्षा के लिए दायित्व मिला है वे अपने उन कार्यों और कर्त्तव्यों में पवित्रता एवं पारदर्शिता रखें तो किसी भी ईडी एवं सीबीआई कार्रवाई की जरूरत नहीं होगी। नि:संदेह राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती दिखाया जाना समय की मांग है, लेकिन बात तब बनेगी, जब नेताओं और साथ ही नौकरशाहों के भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच एवं सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर तेजी से होगी। कहीं राजनीतिक भ्रष्टाचार की सख्त कार्रवाइयों में नौकरशाही को भ्रष्ट होने के लिये खुला न छोड़ दें? यह ज्यादा खतरनाक होगा।

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