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    कोरोना ने विज्ञान को कटघरे में खड़ा किया

    Corona puts science in the dock
    कभी-कभी दुनिया में कुछ ऐसी बीमारियां जन्म ले लेती है जिनका जवाब आम आदमी तो दूर विज्ञान के पास भी नहीं होता। कुछ ऐसा ही वर्तमान में नजर आ रहा है चीन के वुहान शहर से जन्मा कोरोना वायरस ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। क्योंकि कोरोना वायरस के जन्म को तीन महीने बीत चुके हैं। इस महामारी ने दुनिया को तबाह कर दिया है और अभी भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। एक के बाद एक बड़ी संख्या में लोगों को निगल रहा है। कोरोना से पीड़ित परिवार मातम मना रहा है और विज्ञान कोरोना के आगे बेबस नजर आ रहा है।
    अभी तक कोरोना से ठीक होने का इलाज तो दूर रोकथाम के लिए भी कोई वैक्सीन ईजाद नहीं हो पाई है। डॉक्टर उम्मीद कर रहे हैं कि गर्मी आते ही यह वायरस समाप्त हो जायेगा। दावा यह भी किया गया कि सूर्य की तपिश के आगे कोरोना वायरस टिक नहीं पायेगा। ये बात कितनी सच है यह तो वक्त बतायेगा। फिलहाल जिन देशों में गर्म मौसम चल रहा है वहां भी वायरस की चपेट से लोगों की मौतें हो रही है। दुनिया में ऐसे-ऐसे देश हैं जहां विज्ञान को लोहा माना जाता है। गम्भीर से गम्भीर बीमारी का इलाज तलाशने में कामयाबी हासिल की है मगर कोरोना ने अपने आगे वैज्ञानिकों, शोधकतार्ओं और डॉक्टरों को नेस्तनाबूत कर दिया। अगर आप अखबार और टेलीविजन देखें तो रोज एक नई खबर आती है। डॉक्टरों ने कोरोना का सही इलाज ढूंढ़ निकाला। ये बात भी सच है कि कोरोना के चक्कर में शोधकर्ताओं की टीम दिन-रात लगी है।
    लेकिन आधुनिकता के जमाने में कई सवाल हैं। कई दावे ये भी है कि मलेरिया की दवा से कोरोना का इलाज संभव है, यही नहीं अमेरिका का राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प भी बार बार टीवी पर ज्ञान देते नजर आते हैं कि हमारे डॉक्टरों ने कोरोना का सशक्त इलाज खोज निकाला। यह बात कहते हुए मैं किसी डॉक्टर के ऊपर सवाल नहीं खड़े कर रहा। फिर भी हमें गम्भीरता से सोचना चाहिए की आखिर कोरोना का तोड़ क्यों नहीं मिल पा रहा है। यह सब तब हो रहा है जब विश्व में एक से बढ़कर एक नई आधुनिकता वाले उपकरण मौजूद है। मैं कोई डॉक्टर नही हूं लेकिन विश्व भर में हुए कोरोना के फैलाव के असर ने सोच को अलग आयाम पैदा किया है। चीन से लेकर इटली, अमेरिका, ईरान और भारत में इन सबके बावजूद मौतें हो रही है यह सब आँखों के सामने हो रहा है। तो लगता है कि आधुनिकता का ढांचा चरमरा गया है। क्या यह समय जीवन मृत्यु को छोड़कर आधुनिक व्यवस्था को लेकर मनन करने का नहीं है।
    दुनियाभर के देश अपने यहां अलग अलग दावे कर रहे हैं कि हमने कोरोना से लड़ने और रोकने के तरीके ईजाद कर लिए हैं। चीन में पिछले दो दिनों से किसी के मौत की खबर नहीं आई तो क्या हम मानकर चलें कि कोरोना समाप्त हो रहा है या फिर चीन ने कोई तोड़ निकाल लिया है। अगर ऐसा कुछ है तो चीन वह सब उपाय बतायेगा जो उसने रोकथाम में अपनाएं है। कोरोना वायरस के टीके पर शोध बहुत ही अभूतवूर्व गति से हो रहा है लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि यह सफल होगा या नहीं और क्या वैश्विक स्तर पर यह सभी को दिया जा सकेगा। अगर सब सही जाता है तो ऐसा अनुमान है कि 12 से 18 महीनों में यह टीका बन सकता है। यह इंतजार का एक बहुत लंबा समय होगा जब दुनिया पहले ही इतनी पाबंदियों का सामना कर रही है। खैर ये दूर की कौड़ी है सबको अपना देखना है तभी जाकर बात बनेगी।  शोधकतार्ओं ने ये भी पाया कि प्रकोप के शुरूआती चरण में अस्पताल में दाखिल हुए 41 मरीजों के सैंपल में 27 लोग ऐसे थे जो मछली बाजार के संपर्क में आए थे।
    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोरोना प्रकोप कि शुरूआत में सामने आई परिकल्पना अभी भी प्रबल है कि ये बीमारी किसी जानवर के जरिए मनुष्य में फैली। मगर क्या एक व्यक्ति से इतना तीव्र प्रकोप फैल सकता है। यही नहीं अगर आप इससे पहले हुई महामारी को देखें तो कई सालों बाद पता चला। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पश्चिमी अफ्रीका में 2014 से 2016 तक फैला इबोला प्रकोप सबसे अधिक व्यापक था और इससे 11,000 से अधिक लोग मारे गए थे और 28,000 से अधिक लोग संक्रमित हुए थे। इस बीमारी को जन्म देने वाले वायरस के बारे में पहली बार 1976 में पता चला था। ईबोला प्रकोप का असर दो साल तक रहा। हालांकि, ईबोला के मामले दस देशों मे पाए गए इनमें से अधिकतर पश्चीमी अफ्रीका में थे। मगर कुछ मामले अमेरिका, भारत, ब्रिटेन, स्पेन और इटली में भी पाए गए थे।
    वैज्ञानिकों का निष्कर्ष था कि पश्चीमी अफ्रीका में फैले ईबोला प्रकोप की शुरूआत गिनी के दो साल के लड़के से हुई और माना जाता है कि उसमे इस वायरस का संक्रमण चमगादड़ों से हुआ। तब माना गया कि यह महामारी तब हुई जब एक बच्चा घर के बाहर एक ऐसे पेड़ के नीचे खेल रहा होगा जहां चमगादड़ों का झुंड रहता था। स्पेनिश फ्लू को लेकर भी तब भी विज्ञान को कुछ समझ नहीं आया था। स्पेनिश फ्लू ने दुनियाभर के 5 करोड़ लोगों को लील गया था। कुछ भी हो, कोरोना ने विज्ञान को हिलाकर रख दिया है। क्या विज्ञान कोरोना से कोई सीख लेगा। ताकि भविष्य में कोई नई महामारी होने पर तुरंत काबू पाया जा सके।
    ब्रजेश सैनी

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