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    सशक्त विपक्ष के बिना लोकतंत्र अधूरा

    democracy

    भारतीय लोकतंत्र के सम्मुख एक ज्वलंत प्रश्न उभर के सामने आया है कि क्या भारतीय राजनीति विपक्ष विहीन हो गई है? आज विपक्ष इतना कमजोर नजर आ रहा है कि सशक्त या ठोस राजनीतिक विकल्प की संभावनाएं समाप्त प्राय: लग रही हैं। भले ही पूर्व दशकों में कांग्रेस भारी बहुमत में आया करती थी परन्तु छोटी-छोटी संख्या में आने वाले राजनीतिक दल लगातार सरकार को अपने तर्कों एवं जागरूकता से दबाव में रखते थे, अपनी जीवंत एवं प्रभावी भूमिका से सत्ता पर दबाव बनाते थे, यही लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण था। लेकिन अब ऐसी स्थिति समाप्त होती जा रही है। यह स्थिति अचानक तो नहीं आयी है? इसकी असली वजह क्या हो सकती है? आखिर विपक्ष इतना कमजोर एवं नकारा कैसे हो गया? इसका बड़ा कारण सभी विपक्षी दलों का पारिवारिक पार्टियों में तब्दील हो जाना भी है।

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    140 करोड़ की आबादी वाले देश में विपक्ष के पास भाजपा का विरोध के अलावा कोई प्रखर मुद्दा नहीं है। लोकतंत्र में हालांकि यह कहा जाता है कि व्यक्तियों से बढ़कर संस्था या राजनीतिक दल का महत्व होता है परन्तु लोकतंत्र के इस पवित्र व मूल सिद्धान्त को विपक्ष ही समाप्त कर रहा है। आज देश में विपक्ष के पास कोई प्रभावी नेतृत्व नहीं है, जो देश की ज्वलंत समस्याओं के समाधान के लिए अपनी स्वतंत्र सोच को उभार सकें। देश में बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, महंगाई इत्यादि संबंधी ढेर सारी समस्याएं मुंह आड़े खड़ी हैं, लेकिन विपक्ष इन मुद्दों को प्रभावी तरीके से नहीं उठा पा रहा और जनता मौन होकर पिसती जा रही है। सशक्त विपक्ष के साथ प्रभावी, सक्षम, समर्थ एवं सर्वस्वीकार्य विपक्षी नेता भी लोकतंत्र की मूल आवश्यकता है।

    जैसाकि आजादी के बाद ताकतवर कांग्रेस पार्टी के शासन में विपक्ष बहुत तेजस्वी एवं प्रभावी रहा है। वही विपक्ष अपनी साफ, पारदर्शी, नैतिक एवं राष्ट्रवादी राजनीतिक मूल्यों के बल पर आज स्पष्ट बहुमत से शासन कर रहा है। विपक्ष अपनी इस दुर्दशा के लिये खुद जिम्मेदार है। विपक्ष वैचारिक, राजनीतिक और नीतिगत आधार पर सत्तारूढ़ दल का विकल्प प्रस्तुत करने में नाकाम रहा है। उसने सत्तारूढ़ भाजपा की आलोचना की, पर कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिया। किसी और को दोष देने के बजाय उसे अपने अंदर झांककर देखना चाहिए। मुद्दा विहीनता उसके लिए इतनी अहम रही है कि कई बार राष्ट्रीय मुद्दों पर उसने जुबान भी नहीं खोली। विपक्ष ने मजबूती से अपनी सार्थक एवं प्रभावी भूमिका का निर्वाह नहीं किया तो उसके सामने आगे अंधेरा ही अंधेरा है।

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