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    लोकतंत्र की प्रक्रिया को हिंसक न बनाएं

    Process of Democracy

    पश्चिमी बंंगाल के विधान सभा चुनावों में अभी वक्त है लेकिन चुनावों में अपना जनाधार मजबूत करने व विपक्षी कार्यकर्ताओं को डराने-धमकाने से प्रदेश में आए दिन हिंसक घटनाएं घट रही हैं, जोकि राजनीति का शर्मनाक चेहरा भी है। बंगाल में अभी नफरत व हिंसा का खेल सरेआम खेला जा रहा है। यदि सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा की परंपरा चलती रही और इसे रोकने का भी प्रयास न किया गया तब यह प्रदेश के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा के बंगाल दौरे के बीच पार्टी के एक और कार्यकर्ता का शव फंदे से लटका हुआ मिला है। भाजपा का आरोप है कि कार्यकर्ता की हत्या कर उसके शव को लकटाया गया है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस पर हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया गया है, दूसरी ओर भाजपा ने हड़ताल पर भी सत्ताधारी पार्टी पर सवाल उठाए हैं।

    भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं। तेज-तर्रार टीएमसी नेता व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अंदाज बेहद जोशीला है। बनर्जी के बयान मीडिया में चर्चा का विषय बनते हैं, भले ही पार्टी के वरिष्ठ नेता के ब्यान पार्टी वर्करों में उत्साह भरने के लिए होते हैं, लेकिन यहां जोश के साथ-साथ होश भी जरूरी होता है। विशेष तौर पर जब हिंसा की संभावना बहुत ज्यादा हो। ममता बनर्जी को यह नहीं भूलना चाहिए कि वह केवल टीएमसी की ही नेता नहीं बल्कि बंगाल की मुख्यमंत्री भी हैं जिसने प्रदेश में शांति व कानून व्यवस्था को कायम रखना है। राजनीति का एकमात्र उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं बल्कि प्रदेश के लोगों के जीवन को खुशहाल बनाना है।

    दूसरी तरफ भाजपा नेताओं को भी प्रदेशवासियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। भाजपा को बंगाल में सरकार बनाने की बजाए प्रदेश की शांति व्यवस्था को ज्यादा महत्व देना चाहिए। कोई भी जीत शांति एवं सोहार्द से बड़ी नहीं हो सकती। इस बार चुनावों में टीएमसी व भाजपा के बीच मुकाबला होने के आसार हैं। चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं। हिंसा लोकतंत्र पर कलंक है। चुनाव सामान्य बदलाव की तरह होने चाहिए, जहां विचारों व मुद्दों की बात होनी चाहिए। यदि उकसाने व हिंसा भड़काने के भाषण जारी रहे तब यहां वोटिंग के दिन की व्यवस्था को संभालना कठिन होगा, वहीं प्रदेश में जान-माल का भारी नुक्सान भी हो सकता है।

     

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