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    Haryana: म्हारी छोरी के छोरो से कम है…. ड्राइवर छोरी बनी दूसरो के लिए प्रेरणा, मुश्किल समय में परिवार के लिए सहारा बनकर खड़ी हुई छोरी

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    Haryana: म्हारी छोरी के छोरो से कम है.... ड्राइवर छोरी बनी दूसरो के लिए प्रेरणा, मुश्किल समय में परिवार के लिए सहारा बनकर खड़ी हुई छोरी

    Haryana: कैथल /जींद, सच कहूं /कुलदीप नैन  पिता मुकेश ड्राइवरी करके और अपनी पुश्तैनी जमीन में खेतीबाड़ी करके परिवार का पालन पोषण कर रहे थे तो मां सुमन गृहणी के रूप में अपने पति का साथ देकर बच्चों को शिक्षित करने में लगी थी। सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन अचानक एक दिन परिवार के ऊपर दुखों का पहाड़ सा टूट पड़ा। पिता की दोनों पैरों की नसें ब्लाक हो गई और साथ ही रीढ़ की हड्डी में भी दिक्कत हो गई। कुछ समय बाद माँ को भी बीमारी ने जकड लिया। इलाज पर भी रुपए खर्च हो रहे थे। घर का गुजारा कैसे चले कुछ समझ नहीं आ रहा था। यहीं से शुरू होती है एक जाबांज और होनहार बेटी की कहानी। हम बात कर रहे है जींद जिले के सफीदों हलके से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गाँव हाडवा की निशु देशवाल की जो आज ड्राईवर छोरी के नाम से मशहूर हो चुकी है।

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    सच कहूँ से विशेष बातचीत में निशु की मां सुमनलता ने बताया कि नीशू ने छठी कक्षा से ही घर के कामकाज में रुचि लेनी शुरू कर दी थी। वह मेहनती, नीडर और ईमानदार है। अच्छे संस्कार उसकी पहचान है। पिता बीमार हुए तो घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। इस मुसीबत में निशु परिवार के लिए संबल बनकर उभरी। पिता चारपाई पर बैठ गए तो निशु ने एक बेटे की तरह जिम्मेवारियां संभालने का बीड़ा उठा लिया। निशु ने उनकी लोडिंग गाड़ी चलाना शुरू कर दी। शुरूआत में पड़ोसी इस काम के लिए उन्हें ताने मारते थे। गांव वाले कहते थे कि छोरी सूट नहीं पहनती, ड्राइवरी करके बनेगी ये पायलेट। लेकिन निशु ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया और मेहनत करती रही। धीरे धीरे सब सामान्य होने लगा। आज स्थिति यह है कि गांव में जो लोग निशु को मर्दों जैसे काम करते देखकर ताने मारते थे, आज वही लोग निशु पर गर्व महसूस करते हैं।

    स्नातक तक पढ़ी है निशु | Haryana

    निशु की उम्र 21 वर्ष है। परिवार में माता पिता और दो भाई बहन है। निशु ने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई गंगोली गांव के निजी स्कूल से की। इसके बाद स्नातक की पढ़ाई पिल्लुखेड़ा से की। स्नातक की डिग्री लेकर नौकरी के लिए युवाओं की भीड़ के साथ किसी कोचिंग सेंटर की तरफ मुड़ने की बजाय निशु ने खुद का स्टार्टअप शुरू किया। उसने अपने पिता के काम को आगे बढ़ाने की सोची ताकि परिवार का गुजारा भी हो सके और पिता का काम भी संभाला जा सके। निशु से जब नौकरी को लेकर सवाल किया गया तो उसने कहा कि सरकारी नौकरी मिले तो उसे परहेज नहीं है लेकिन इस इंतजार में हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकती। जब तक नौकरी नहीं मिलती वह ड्राइवर छोरी बनकर इसी तरह अपने परिवार का सहारा बनी रहेगी।

    हर काम को बखूबी कर लेती है निशु

    निशु का भाई मनदीप जो शुरूआत में गाड़ी चलाने में रूचि नहीं दिखाता था लेकिन जब उसने अपनी बहन को ड्राइवरी करते देखा तो उसने भी गाड़ी चलाने का फैसला किया। अब घर में एक टाटा-एस व एक महिंद्रा पिकअप दो वाहन हैं। दोनों भाई बहनों ने गाड़ियां चलानी शुरू की तो मुसीबत में फंसी घर की गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई। निशु का लाइसेंस बना हुआ है और अब हैवी लाइसेंस की फाइल लगाने जा रही है। मौजूदा समय में निशु लोडिंग गाड़ी चलाती हैं। फसल ढुलाई की बात हो या या पशु छोड़कर आने की या अन्य कोई सामान हो ये ड्राइवर छोरी हर काम को बखूबी कर लेती है । इसके अलावा निशु खेत के सभी कामों और भैंसों के लिए चारा लाने, काटने, चारा डालने, दूध दौहने जैसे कार्य भी कर लेती है।

    हरियाणा रोडवेज चलाने का सपना | Haryana

    निशु कहती है कि जब वह छोटी थी तो अक्सर पिता के साथ गाड़ी चलाने की जिद्द करती थी। हालांकि तब उसे गाड़ी नहीं दी जाती थी। वह स्कूटी, मोटरसाइकिल और साइकिल पर हर समय चढ़ी रहती थी। लेकिन अब ट्रेक्टर, कार, जीप सब वह अच्छे से चला लेती है। अब इस ड्राइवर छोरी का सपना हरियाणा रोडवेज को चलाने का है। परिजनों ने कर्ज लेकर घर बनाया था, फिर कर्ज लेकर ही गाड़ी ली थी लेकिन निशु की मेहनत से कर्ज भी धीरे धीरे सब उतर गया है और जीवन की गाड़ी सरपट दौड़ने लगी है।

     

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