ग्लोबल साउथ की राह पर जरूरी है मिस्र का साथ

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ग्लोबल साउथ की राह पर भारत

Egypt : संयुक्त राज्य अमेरिका की राजकीय यात्रा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम एशिया के एक बड़े देश मिस्र की यात्रा पर हैं। वे यहां दो दिन रहेंगे। इस दौरान पीएम मोदी मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से मिलकर देश और दुनिया के मसलों पर बात करेंगे। द्विपक्षीय वार्ता के दौरान दोनों नेताओं के बीच आपसी संबंधों को मजबूत बनाने तथा करोबार एंव आर्थिक सहयोग के नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी चर्चा होगी। कहा तो यह भी जा रहा है कि द्विपक्षीय वार्ता के दौरान भारत-मिस्र व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (सीईपीए) पर मुहर लगने के साथ-साथ रणनीतिक भागीदारी बढ़ाने पर भी सहमती हो सकती है।

भारत-मिस्र संबंधों के लिहाज से साल 2023 ऐतिहासिक रहा हैं। ऐतिहासिकता की तीन बड़ी वजह हैं- प्रथम, इस साल भारत-मिस्र अपने राजनयिक संबंधो की स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर चुके हैं। द्वितीय, 75 वर्षों की इस यात्रा को यादगार बनाने के लिए मिस्र के राष्ट्रपति अल-सीसी इसी साल गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि की हैसियत से भाग लेने के लिए भारत आए थे। तृतीय, पिछले डेढ दशक के बाद नरेंद्र मोदी पहले ऐसे भारतीय प्रधानमंत्री हैं, जो मिस्र के दौरे पर जा रहे हंै। Egypt

इससे पहले साल 2009 में तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह गुटनिरपेक्ष देशों की शिखर बैठक में हिस्सा लेने के लिए मिस्र गए थे। अब ऐतिहासिकता के इसी दौर को और अधिक पुख्ता करने के लिए मोदी मिस्र की यात्रा कर रहे हैं। मिस्र के साथ भारत के संबंध हमेशा से ही सौहार्दपूर्ण रहे हैं। 15 अगस्त, 1947 को भारत को आजादी मिलने के अगले तीन दिनों में दोनों देशों ने औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित कर लिए थे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर के बीच गहरे दोस्ताना संबंध थे। दोनों नेताओं ने यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी।

50 और 60 का दशक भारत-मिस्र संबंधों का स्वर्ण काल था | Egypt

रणनीतिक स्तर पर भी दोनों देशों के बीच गहरे संबंध थे। नासिर के कार्यकाल में 1956 के अभूतपूर्व स्वेज संकट के दौरान भारत मिस्र के साथ खड़ा थ। कुल मिलाकर कहें तो 50 और 60 का दशक भारत-मिस्र संबंधों का स्वर्ण काल था। लेकिन 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध से जब काहिरा ने सोवियत संघ के नेतृत्व वाले गुट से दूरी बनाते हुए अमेरिका के करीब जाना शुरू किया तो भारत-मिस्र संबंधों में भी शून्यता का भाव भरने लगा । घरेलू मुद्दे और जूदा भू-राजनीतिक विचारों की वजह से शून्यता का यह भाव अगले कुछ दशकों तक बरकरार रहा। कमोबेश यही स्थिति होस्नी मुबारक के शासनकाल में रही। कहा जाता है कि होस्नी जब तक सत्ता में रहे तब तक काहिरा-नई दिल्ली संबंध ठंडे बस्ते में ही रहे।

हालांकि, शीतयुद्ध के दौरान आए इस ठंडेपन ने रिश्तों की खाई को अधिक गहरा नहीं होने दिया और अलग-अलग दौर के भू-राजनीतिक परिदृश्यों के बीच भारत-मिस्र संबंध कमोबेश आगे बढ़ते रहे हैं। कोविड-19 और उसके बाद आए डेल्टा लहर के भयानक दौर ने द्विपक्षीय संबंधों को ठंडे बस्ते से बाहर निकालने का काम किया । डेल्टा लहर के उस भयावह वक्त में मिस्र उन चंद देशों में से एक था जिसने भारत को मेडिकल आॅक्सीजन की सप्लाई मुहैया करवाई। Egypt

मिस्र परंपरागत रूप से भारत के सबसे महत्वपूर्ण अफ्रीकी व्यापारिक साझेदारों में से एक रहा है। मार्च 1978 से दोनों देश मोस्ट फेवर्ड नेशन क्लॉज पर आधारित द्विपक्षीय व्यापार समझौते से बंधे हुए हैं। हाल के वर्षों में भारत-मिस्र व्यापार संबंधों में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 3.15 बिलियन डॉलर के वर्तमान भारतीय निवेश के साथ भारत मिस्र में सबसे बड़े निवेशक के तौर पर उभर कर सामने आया है। भारत की तीन प्रमुख कंपनियों ने मिस्र में ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए 18 बिलियन डॉलर के एमओयू पर हस्ताक्षर किए है।

दोनों देश रक्षा और कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दे रहे | Egypt

भारत, मिस्र से खनिज तेल, उर्वरक, अकार्बनिक रसायन और कपास जैसे उत्पादों का आयात करता है। दूसरी ओर मिस्र भारत को आयरन एंड स्टील, लाइट व्हीकल्स और कॉटन भेजता है। सुरक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, आईटी, फार्मास्युटिकल्स, कृषि, उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में भारत और मिस्र के बीच बहुआयामी साझेदारी मजबूत हो रही है। पिछले कुछ समय से दोनों देश रक्षा और कृषि क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर विशेष जोर दे रहे हैं। पिछले साल खाद्यान संकट के दौरान भारत ने मिस्र को 61 हजार टन गेहूं का निर्यात किया है, जो निर्यात के लिहाज से अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

बहुपक्षीय मंचों पर मिस्र के साथ हमारा उत्कृष्ट सहयोग है। क्षेत्रीय और दूसरे वैश्विक मुद्दों पर भी दोनों देशों का साझा दृष्टिकोण है। दोनों देश अपने राजनयिक संबध्ंों की स्थापना के 75 वर्ष पूरे कर चुके हैं। इसके बावजूद यह प्रश्न परेशान करने वाला है कि अरब जगत की इस बड़ी शक्ति के साथ संबंधों के मामले में भारत अब तक इतना संजिदा क्यों बना रहा। राजनयिक संबंधों का साढ़े सात दशकों का काल कोई छोटी बात नहीं है, फिर भी विदेश नीति के मोर्चें पर मिस्त्र हमारा प्रमुख सहयोगी क्यों नहीं बन सका। यह प्रश्न भी विचारणीय है।

भारत ने जी-20 शिखर बैठक में मिस्र को भी आमंत्रित किया है | Egypt

सच तो यह है कि एशिया, अफ्रीका और यूरोप के त्रिकोण पर अवस्थित होने के बावजूद मिस्र हमारी विदेश नीति में हमेशा हाशिये पर रहा। लेकिन अब यूके्रन पर रूसी हमले के बाद तेजी से बदल रहे वैश्विक परिदृश्य में भारत सामरिक मोर्चें पर मिस्र की अहमियत को समझने लगा है। दूसरा, पीएम मोदी की मिस्र यात्रा की एक बड़ी वजह यह भी कही जा रही है कि भारत ने जी-20 शिखर बैठक में मिस्र को भी आमंत्रित किया है। लेकिन पिछले दिनों मिस्र कश्मीर में हुई जी-20 वर्किग ग्रुप की बैठक में शामिल नहीं हुआ। चीन, तुर्की और सऊदी के प्रतिनिधि भी बैठक में नहीं आए थे। भारत-चीन संबंध जग जाहिर है। कश्मीर मसले पर तुर्की भी भारत का मुखर विरोधी रहा है। ऐसे में भारत की चिंता इस बात को लेकर थी कि कहीं मिस्र चीन के पाले में न चला जाए। मोदी की मिस्र यात्रा की एक वजह यह भी है कि भारत अपनी लुक वेस्ट नीति के तहत पश्चिम एशिया और अफ्रीका में अपने लिए संभावनाओं के नए द्वार खोलना चाहता है, इसलिए भी वह मिस्र को अहमियत दे रहा है।

जहां तक द्विपक्षीय सहयोग की बात है तो दोनों देश एक-दूसरे के लिए मददगार साबित हो सकते हैं। सैन्य ताकत बनने का इच्छुक मिस्र भारत से सैन्य हेलिकाप्टर, तेजस लडाकू विमान, आकाश मिसाइल सहित दूसरे सैन्य उपकरण चाहता है। ब्रिक्स की सदस्यता के लिए भी मिस्र भारत का सहयोग चाहता हौ दूसरी ओर भारत चीन पर अपनी आयात निर्भरता कम करना चाहता है। ऐसे में मिस्र भारत की खाद और गैस की आपूर्ति में मदद कर सकता है।

नि:संदेह, मिस्र के साथ द्विपक्षीय संबंधों में यह एक महत्वपूर्ण अवसर है, जब भारत अपनी सैन्य कूटनीति के फलक पर मध्य पूर्व एवं उत्तर अफ्रीकी देशों के साथ अपने सुरक्षा सबंधों का विस्तार कर रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिस्र दौरा भारत-मिस्र संबंधों के लिहाज से तो अहम है ही भारत की ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत बनाने में भी कारगर साबित होगा। prime minister narendra modi

डॉ. एनके सोमानी, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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