परिवारवाद की राजनीति

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लोक जनशक्ति पार्टी में लोकतंत्र की जंग चाचा-भतीजे की जंग बनती जा रही है। बिहार से पशुपति कुमार पारस ने लोक सभा में सांसद और पार्टी अध्यक्ष अपने भतीजे चिराग पासवान के खिलाफ बगावत शुरू कर दी है। लोक सभा सदस्य पशुपति ने पार्टी के पांच सांसद सदस्यों के समर्थन के साथ खुद को सदन में पार्टी का नेता चुन लिया है। चिराग पार्टी के पूर्व प्रधान एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय राम विलास पासवान के बेटे हैं। परिवार में इस बगावत के कारण पार्टी टूटने की कगार पर पहुंच गई है। दरअसल राजनीतिक पार्टी पर कब्जा करने की लड़ाई परिवार की जमीन-जायदाद की लड़ाई की तरह बन गई है। पार्टियों में आंतरिक व बाहरी लोकतंत्र समाप्त हो गया है। पार्टी को वंश की विरासत समझकर बेटे को पार्टी का बड़ा पद दिया जाता है, जो पार्टी में अन्य वरिष्ठ नेताओं को बर्दाश्त नहीं होता।

यदि शुरूआत में ही पदों की लालसा भावनात्मक रूप से करने की बजाय निष्ठावान, कर्मठ कार्यकर्ता व पार्टी की पारंपरिक व लोकतांत्रिक तरीके से की जाए तब ऐसे विवाद और संकट शायद पैदा न हों। पार्टियों में राजनीतिक कलह वास्तव में सत्ता-सुख भोगने की इच्छा का भी परिणाम है और इस मामले में सबसे अधिक उन नेताओं की ही चलती है जो पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के परिवारिक सदस्य होते हैं। यह केवल बिहार में ही नहीं उत्तर प्रदेश, पंजाब सहित देश के कई राज्यों की राजनीति में ऐसा चलन चल रहा है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच पार्टी के पदों को लेकर लड़ाई होती रही। पंजाब में पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के परिवार में यही चलन पार्टी में फूट का कारण बना और आखिर मनप्रीत सिंह बादल ने अलग पार्टी पीपुल्ज पार्टी आफ पंजाब का गठन किया था।

पार्टियों में परिवारवाद की राजनीति के कारण बढ़ रही कलह राजनीति में बदलाव का संकेत देती है। इस समस्या से हर छोटी-बड़ी पार्टी जूझ रही है। भले ही अपनी मर्जी से पार्टी को चुनना प्रत्येक नेता का अधिकार है लेकिन हवा भांपकर दल बदलना राजनीतिक अस्थिरता के साथ-साथ जनता के भरोसे के खिलाफ है, जो लोकतंत्र को कमजोर करने वाली प्रवृति है। इस चलन को देखकर आम लोगों का राजनीति से विश्वास उठ रहा है। वास्तव में राजनीति राज करने की नीति थी जिसे अब सत्ता-सुख भोगने की नीति बना दिया गया है। राजनीति से त्याग और सेवा जैसे गुण गायब हो गए हैं। नेताओं को फिर महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, डा. एपीजे अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपायी जैसे महान नेता के पद्चिन्हों पर चलने की आवश्यकता है। यहां जनसेवा व राष्टÑ सेवा की बात हो, परिवार व पद की चर्चा न हो।

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