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    भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘मुफ्त’ एक बड़ी समस्या के जैसा

    In the Indian economy, like 'free' a big problem

    लग रहा है कि राजनीति ने हमारे देश की आर्थिकता को अंधेरे में रखना शुरू कर दिया है, जहां विज्ञान, सिद्धांतों और नियमों की कोई बात नहीं हो रही। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल अपने ताजा शगूफों भरे निर्णयों से दिल्ली वासियों को 200 यूनिट तक बिल माफ और 400 यूनिट तक 50 प्रतिशत सब्सिडी देने की घोषणा की है। इससे पूर्व केजरीवाल ने महिलाओं के लिए मेट्रो में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने की घोषणा की थी। जहां तक ताजा निर्णय का संबंध है पिछले 67 वर्षों से जब भी दिल्ली में विधान सभा चुनाव होते हैं एक बार भी व्यक्तिगत या संयुक्त रूप से जनता की ऐसी कोई मांग सामने नहीं आई कि मुफ्त बिजली की सुविधा दी जाए।

    लोग सस्ती व निर्विघ्न बिजली आपूर्ति की मांग अवश्य चाहते हैं लेकिन मुफ्त नहीं। स्पष्ट है कि केजरीवाल सरकार के निर्णय आगामी विधान सभा चुनावों को जीतने की मंशा से लिए गए हैं। समाज व बाजार अर्थशास्त्री भी किफायती रेटों की बात करता है, मुफ्त की नहीं। 400 यूनिट तक 50 प्रतिशत रेट कम करना भी तर्कसंगत नहीं क्योंकि 200 से अधिक यूनिट बिजली की खपत एसी वाले उपभोक्ताओं के ही आते हैं इसीलिए यह निर्णय गरीब व्यक्ति को ध्यान में रखकर नहीं लिया गया। यदि किसी उत्पाद या सेवा पर राज्य जो भी न्यूनत खर्च करता है तब उसका मुल्य अर्जित करना जरूरी होता है।

    विशेष तौर पर विकासशील देशों में मुफ्त सुविधाएं देने की कोई संभावना ही नहीं। इससे पूर्व भी ऐसे अनुभव किए जा चुके हैं जिससे वोट की फसल तो खूब तैयार हुई लेकिन कंपनियां फेल हुई। पंजाब की अकाली भाजपा सरकार ने कृषि के लिए मुफ्त बिजली देने की शुरूआत की, लेकिन 20 वर्षों बाद भी बिजली निगम हजारों करोड़ के घाटे में है। सरकार बिजली निगम को सब्सिडी देने के भी समर्थ नहीं रही। एक तरफ कृषि को मुफ्त बिजली दी गई, दूसरी तरफ आम जनता व उद्योगों के लिए पंजाब देश भर में सबसे अधिक महंगी बिजली वाला राज्य बन गया जिससे उद्योग पंजाब से अन्य राज्यों में शिफ्ट हो गए। पंजाब आज उद्योगों को तरस रहा है। केजरीवाल के निर्णय भी तुगलकी फरमान साबित हो सकते हैं। आर्थिक निर्णय बाजार के नियमां अनुसार ही लिए जाने चाहिए। आर्थिकता से राजनीतिक खिलवाड़ देश के लिए समस्याएं पैदा कर सकता है।