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    तेपला की चौपाल से दिल्ली के गलियारों तक, क्या पाइप वाली राजनीति अब पंचायत वाली जिम्मेदारी बनेगी?

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    Ambala तेपला की चौपाल से दिल्ली के गलियारों तक, क्या पाइप वाली राजनीति अब पंचायत वाली जिम्मेदारी बनेगी?

    अंबाला (सच कहूँ ब्यूरो) अक्सर सरकारी योजनाओं का अंत एक शिलालेख या उद्घाटन पट्टी पर आकर रुक जाता है, लेकिन अंबाला के खंड साहा का गांव तेपला रविवार को एक अलग ही बदलाव का गवाह बना। विश्व जल दिवस के अवसर पर आयोजित जल अर्पण दिवस केवल एक आयोजन भर नहीं था, बल्कि यह उस सरकारी व्यवस्था की विदाई थी जहाँ ग्रामीण पानी के लिए विभाग का मुँह ताकते थे। अब तेपला के तीन ट्यूबवेल, बिछी हुई पाइपलाइन और उनसे आने वाली हर बूंद की कमान ग्राम जल एवं सीवरेज समिति के हाथों में है।

    इस बदलाव की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के वातानुकूलित कमरों से केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल और राज्य मंत्री श्री वीरन्ना सोमन्ना वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए सीधे गांव की मिट्टी से जुड़े। संवाद के दौरान जब ग्रामीणों ने स्वच्छ पानी की सुचारू सप्लाई की पुष्टि की, तो सत्ता के गलियारों में बैठे मंत्रियों ने इसे जल जीवन मिशन की बड़ी उपलब्धि माना। लेकिन इस डिजिटल संवाद के पीछे एक बड़ा सामाजिक सवाल भी छिपा है कि क्या हमारी पंचायतें तकनीकी रूप से इतनी सक्षम हो गई हैं कि वे विभाग की मदद के बिना इस जटिल तंत्र को संभाल सकें?

    मंत्रालय की डिप्टी सेक्रेटरी डॉ. अंकिता चक्रवर्ती की मौजूदगी में समिति सदस्यों का सम्मान तो हुआ, लेकिन असली सम्मान तब होगा जब पाइपलाइन में आने वाली पहली लीकेज को ठीक करने के लिए पंचायत को सरकारी बजट का इंतज़ार न करना पड़े। उपायुक्त अजय सिंह तोमर ने जिला स्तर पर मिशन की सफलता के आंकड़े तो पेश किए, पर तेपला की चौपाल पर खड़े ग्रामीण नरेंद्र सिंह की बातों में व्यावहारिक भरोसा दिखा। उन्होंने साफ़ किया कि फिलहाल गांव के हर घर में नल है और सप्लाई का समय भी निर्धारित है।

    रिपोर्टों के अनुसार, गांव की इस समिति को अब न केवल पानी का वितरण करना है, बल्कि संसाधनों की सुरक्षा और भविष्य के प्रबंधन का जिम्मा भी उठाना है। यह प्रयोग अगर सफल रहता है, तो यह विकेंद्रीकरण का सबसे बड़ा उदाहरण बनेगा। फिलहाल, तेपला में जल संरक्षण की शपथ ली जा चुकी है और उत्सव का माहौल है, लेकिन इस योजना की असली परीक्षा उन दिनों में होगी जब गर्मी अपने चरम पर होगी और जल स्तर नीचे जाएगा। तब देखना होगा कि जल अर्पण का यह संकल्प जमीनी धरातल पर कितना गहरा उतरता है।