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    सोने की खान, फिर भी नहीं बनी पहचान

    Gold mine, still not recognized
    उत्तर प्रदेश के सोन भद्र इलाके से 3000 टन सोने की चट्टान मिलने की खबरें हैं। इससे पहले पिछले वर्ष राजस्थान के बांसवाड़ा में भी सोना मिलने की खबरें थीं। सोना मिलने से केन्द्र के साथ-साथ राज्य सरकारें भी खुश हैं। इन खबरों के साथ ही अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत दौरे की खबर भी सोने पर सुहागा है। अमरीकी राष्ट्रपति का दौरा देश की आर्थिक अहमियत को दर्शाता है।
    भारत दुनिया की एक बड़ी मंडी है। अमेरिका, चीन सहित अन्य बहुत सारे देश अपना सामान बेचने के लिए भारत की तरफ देखते हैं। पर आम भारतियों में अभी अपने आप को ‘सोन देश’ के वासी होने का अहसास नहीं है। सोना चाहे सोनभद्र में मिला है पर यह तथ्य हैं कि कभी सारा देश ही सोने की धरती थी। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था पर अपने इस रुतबे को देश बुरी तरह गंवा चुका है। कृषि के नजरिये से सारी धरती ही सोना उगलती थी। खाद्य-खुराक पहनावे, पैसे व गहने वाली संस्कृति भारत की अमीरी को दर्शाती थी। विदेशी हमलावर भारत की धन दौलत के आकर्षण के कारण ही लूटने आते थे। आज विदेशी शासक व्यापार के लिए आ रहे हैं भारत से बहुत कुछ हासिल करना चाहते हैं।
    अब सरकार को यह बात सोचने की जरूरत है कि आखिर विदेशियों के आकर्षण का केन्द्र होने के बावजूद सोने की चिड़िया अब लोहे की चिड़िया क्यों बनी हुई है? आज देश का किसान, व्यापारी क्यों परेशान हैं? बड़े देश से दोस्ती के बावजूद देश का आर्थिक रुतबा नजर नहीं आता। अमीर देश से संबंध बनाते समय हमें अपनी हालत मजबूत करने पर भी ध्यान रखना पड़ेगा। हमारे हर खेत से सोना उगल सकता है व किसान खुशहाल हो सकता है, व्यापारी कारोबारी भी सुनहरी व्यापार कर सकते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारा पीछे रहने का बड़ा कारण हमारी राजनीति है जो सिर्फ वोटों या चुनाव की राजनीतिकरण बन कर रह गई है जिसका मकसद हर हाल में सत्ता हासिल करना है। हर चीज का राजनीतिक होना आपसी भाईचारे को कमजोर कर रहा है। भाईचारे व अमन के बिना तरक्की मुमकिन ही नहीं। यदि नजरिया गैर राजनीतिक व वैज्ञानिक बने तो देश में सोना ही सोना हो।

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