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    स्वर्णिम पल  अविस्मरणीय इतिहास को संजोए है ‘गौरवशाली दिवस 25 मार्च’

    Ram Rahim

    आज नन्हे-नन्हे कदम उस स्वर्णिम इतिहास सृजन को आगे बढ़े (Ram Rahim) जिसका मानव जाति और ये सृष्टि युगों-युग ऋण नहीं उतार पाएगी। ये गौरवशाली ऐतिहासिक दिन था 25 मार्च सन् 1973। मार्च महीने का अंतिम रविवार था, सूर्योदय की लालिमा के बीच टिमटिमाता उजाला रात के अंधेरे को चीरते हुए आज दुनिया के लिए इन्सानियत की नई सवेर का सबब बनने वाला था। ज्यों ही शाह मस्ताना जी धाम में सत्संग हुआ, तो रूहानी तेज से चमकते ललाट की आभा बिखेरता साढ़े 5 साल का एक बालक अपने पिता जी की उंगली थामे कोमल कदमों से नामदान पंडाल की ओर बढ़ने लगता है।

    यह ऐसी मुक्द्दस घड़ी थी जो पूरी दुनिया के लिए खास लम्हा बनने वाली थी। डेरा सच्चा सौदा इस दिन फिर से अपना इतिहास दोहराने वाला था। ‘काका तू एत्थे आके बैठ’ पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने जैसे ही पंजाबी अंदाज में प्यार से पुकारा तो यह नूरो नूर बालक अपने पिता के साथ अग्रणी पंक्ति में आकर बैठ गया। यह लम्हा बड़ा दिलचस्प था, क्योंकि पिता-पुत्र की यह अनूठी जोड़ी एक साथ गुरुमंत्र लेने पहुंची थी। पूजनीय परमपिता जी ने इतनी छोटी उम्र में जिस बालक को पास बैठाकर नाम की दात बख्शी, ये बालक कोई और नहीं बल्कि स्वयं सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (Ram Rahim) ही थे। इस प्रकार ‘एमएसजी’ की सृजना पूर्ण हुई। कुल मालिक पूजनीय परमपिता जी ने अपने गद्दीनशीन को पहले ही ढूंढ लिया। डेरा सच्चा सौदा के इतिहास में 69 वर्ष पूर्व भी पूज्य सार्इं बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज को अपने मूढ़े के पास बैठाकर गुरुमंत्र की दात बख्शी थी।

    पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां इस पावन लम्हें का जिक्र करते हुए फरमाते हैं कि प्यारी साध-संगत जीओ ये जो एमएसजी शब्द बना है, उसका कारण ये (मार्च) महीना भी है। इस महीने में परमपिता परमात्मा शाह सतनाम जी महाराज ने इस खाक को, आपके जो हम सेवादार हैं, अब तो बेपरवाह जी इस बॉडी से काम ले रहे हैं। हमें 25 मार्च 1973 में गुरुमंत्र दिया था, अपने साथ जोड़ा था। महीने का लास्ट सत्संग था, उस समय हम लगभग साढ़े पाँच साल के रहे होंगे। बेपरवाह जी ने हमें अपने पास बुलाकर हमें गुरुमंत्र दिया था।

    MSG Bhandare

    मस्ताना जी धाम में जो तेरावास है, जो हॉल की तरफ गेट है, उस तरफ वहां जगह खाली थी और वहीं पर कनातें लगी हुर्इं थी। बेपरवाह जी का मुख पंडाल की तरफ था और हॉल की तरफ उनका बायां हाथ था। तो वहां पर हम अपने पिता जी (पूज्य बापू नम्बरदार मग्घर सिंह जी) के साथ बैठे थे। हम दोनों ही आए थे। उस समय थोड़ी साध-संगत होती थी तो वहीं बैठ जाते थे। फिर बेपरवाह जी आकर बैठे और बैठते ही उन्होंने हमें बुलाया कि ‘‘काका तू एत्थे आके बैठ’’ तो हम बापू जी के साथ आगे आकर बैठे थे तो वो 25 मार्च का दिन था, हमें याद आता है कि वो महीने का लास्ट सत्संग था 1973 में। तो इसलिए आपके लिए ये खुशी का दिन है। बेपरवाह जी ने गुरुमंत्र देते ही ‘एमएसजी’ बना दिया। ये उनका रहमोकरम।

    पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने वचन किए थे हम थे,
    हम हैं और हम ही रहेंगे।
    एम-पूजनीय बेपरवाह शाह
    मस्ताना जी महाराज
    एस-पूजनीय परमपिता शाह
    सतनाम जी महाराज
    जी -पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत
    राम रहीम सिंह जी इन्सां
    इस तरह कंप्लीट हो गया ‘एमएसजी’, इसलिए हमने इसका नाम रख
    दिया ‘एमएसजी’।

    इस शुभ वेला पर वो ऐतिहासिक स्मरण भी स्वयंमेव उभर आया था जब 15 अगस्त 1967 को पूजनीय परमपिता जी ने शाह मस्ताना जी धाम में रूहानी मजलिस के दौरान एकाएक शाही स्टेज का मुख पश्चिम की ओर करने का वचन फरमाया था, क्योंकि ये वो ही दिन है, जब पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (Ram Rahim) ने श्रीगुरुसर मोडिया, जिला श्रीगंगानगर (राजस्थान) में अवतार धारण किया। चहुंओर अद्भुत नज़ारा था और प्रकाश पुंज अपनी आभा बिखेर रहा था और अनंत खुशियों की बौछार से आलम झूम रहा था।

    msg

    पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज जब भी पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम

    रहीम सिंह जी इन्सां (Ram Rahim) के साथ किसी भी विषय पर विचार-विमर्श करते तो हमेशा फरमाते कि ‘‘आपां ये काम करेंगे’’, अर्थात् हम और आप एक हैं और हम हमेशा आपके साथ हैं। सन् 1990-91 की रूहानी मजलिसों और रूहानी सत्संगों में अक्सर पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज और पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां खिलखिलाकर हँसते और मुस्कुराते तो बिल्कुल एक समान दिखते। अब जब भी डॉ. एमएसजी खिलखिलाकर हँसते हैं तो वो अविस्मरणीय यादें मानस पटल पर फिर से जीवंत हो उठती हैं।

    पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज बाग में घूमने जा रहे थे तो रास्ते में पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां बाल स्वरूप में अपने आदरणीय पिता पूज्य बापू नम्बरदार मग्घर सिंह जी के साथ वहां मौजूद थे। इस पर पूजनीय परमपिता जी ने सेवादारों से पूछा कि ये कौन हैं तो सेवादारों ने बताया कि ये श्री गुरुसर मोडिया के नम्बरदार मग्घर सिंह जी हैं और उनके साथ उनके इकलौते बेटे हैं। इस पर बाल रूप को निहार पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज जी मुस्कुराए और आगे चले गए।

    महीने के अंतिम रविवार का सत्संग था। गाँव झुम्बा जिला भटिण्डा निवासी स. कर्म सिंह बताते थे कि पूजनीय परमपिता जी जब नामाभिलाषी जीवों को नाम देने के लिए तेरावास से बाहर आए तो सबसे पहले आपजी ने फरमाया कि वो गुरुसर मोडिया वाले नम्बरदार जी कहां हैं तो सेवादारों ने बताया कि जी, वो तो नाम वाले जीवों में बैठे हैं। इसके बाद सतगुरु जी नामाभिलाषी जीवों को नाम देने पहुँचे।

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