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    सरकार को किसान बनकर किसान की पीड़ा जाननी चाहिए

    जंतर-मंतर, महाराष्ट, मध्यप्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में किसान आन्दोलन कर रहे हैं। देशभर में किसान कर्ज व आत्महत्याओं का सिलसिला दिन-ब-दिन जटिल होता जा रहा है। भारत में अभी भी एक बहुत बड़ी आबादी कृषि क्षेत्र से न केवल जीविकोपार्जन कर रही है, बल्कि उनकी भावी पीढ़ियों का निर्वाह एवं विकास भी कृषि पर टिका हुआ है।

    पिछले बीस वर्षों में करोड़ों एकड़ भूमि सड़कों, पुलों, औद्योगिक क्षेत्रों, शहरी विकास की खातिर केन्द्र व राज्य सरकारों ने अधिगृहित कर किसानों से ले ली है। इतना ही नहीं, धरती के ऊपरी स्तर पर व भूमिगत जल की भी भयंकर कमी खड़ी हो गई है।

    इतनी सब समस्याओं के बावजूद भी करोड़ों किसान बची हुई जमीन व बचे हुए पानी के सहारे न केवल अपना पेट भर रहे हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी कच्चा माल उपलब्ध करवा रहे हैं और पूरी शहरी आबादी के लिए धान, गेहूं, सब्जी, फलों का उत्पादन कर रहे हैं। इस पर यदि वह कर्ज एवं आत्महत्या एवं आन्दोलनों में पिस रहे हैं, तब नि:संदेह सरकार कहीं न कहीं किसानों के साथ बहुत बड़ी हेराफेरी में लिप्त है।

    किसान की मांग यही है कि उसे उसकी फसल का लागत मूल्य देकर 20 से 50 प्रतिशत तक लाभांश दे दिया जाए। जो उपज सरकार खरीद करे, उसका दाम तत्काल या एक-आध हफ्ते में उसे दे दिया जाए। यह कोई ज्यादा बड़ी मांग नहीं है।

    क्योंकि इस देश में नकली कीटनाशकों, नकली बीजों, नकली दूध, मसालों, चीनी, गुड़ में मिलावट का अरबों रुपए का कारोबार चल रहा है। इसके अलावा देशभर में लोकसेवकों के वेतन भत्ते, यहां तक कि रिटायर कर्मियों की पेंशन तक के लिए सरकार प्रतिवर्ष करोड़ों-अरबों की वेतन वृद्धि कर देती है, लेकिन किसान की उपज के मूल्य बढ़ाने में उसे सालों लग रहे हैं।

    उस पर से तुर्रा यह है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। देश में कृषि एवं कृषकों की कोई प्रधानता नहीं है। यह महज एक भावनात्मक जुमला है, जो वोटों के वक्त अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में चलाया जाता है। देश में केन्द्रीय एवं राज्य स्तर पर अभी तक जो कृषि नीतियां बनाई या चलाई जा रही हैं, इनमें व्यवहारिकता का अभाव है। सरकार की योजनाएं एवं कृषि नीतियां जमीनी स्तर पर फुस्स हो रही हैं।

    कृषि से जुड़ी योजनाओं एवं रियायती कर्ज में देश का व्यापारी वर्ग नकली किसान बनकर बहुत बड़ी सेंध लगा रहा है और सरकार यही समझ रही है कि उसने कृषि में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर दिए, लिहाजा किसान राजनेताओं या विरोधी दलों के इशारों पर शोर मचा रहे हैं, जोकि एक गलत धारणा है। अफसोस, हर सरकार इन धारणाओं का शिकार होती आ रही है।

    भारतीय कृषि विकास में देश को विकसित व सम्पन्न बनाने की अपार संभावनाएं हैं। सरकार को स्वयं किसान की तरह सोचना व कार्य करना होगा, अन्यथा किसानों के साथ ठीक ऐसा ही होता रहेगा कि कोई पेड़ काटकर कागज बनाए, फिर उस पर लिखे व दूसरों को समझाए कि पेड़ हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।

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