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    पदों का लालच और राजनीति का सिद्धांत

    Editorial
    अशोक गहलोत और सचिन पायलट

    राजस्थान में कांग्रेस की सरकार में आंतरिक खींचतान थमने का नाम नहीं ले रही। (Editorial) यह खींचतान जहां पुराने और युवा नेताओं के बीच है, वहीं कुर्सी का मोह भी इस खींचतान की बुनियाद है। सत्ताधीश नेताओं को दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ तो मुख्यमंत्री विपक्षी दलों के चुनौतियों से निपटने की रणनीति बनाता है, वहीं दूसरी तरफ वह अपनी पार्टी में बने अन्य गुटों पर भी नजर रखनी है।

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    वास्तव में प्रत्येक पार्टी अपना यूथ विंग बनाए हुए हैं। पार्टी का उद्देश्य जहां एक विंग के (Editorial) माध्यम से युवा वोटरों तक पहुंच बनाना है वहीं पार्टी गतिविधियों को मजबूती देने के लिए उनका प्रयोग करना है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने यूथ को नेतृत्व देने की नीति बनाई, जिसके फायदा-नुकसान दोनों ही हैं। फायदा तो यह हुआ कि युवा राजनीति में सक्रिय हुए, जिससे युवाओं में देश व सामाजिक मुद्दों के प्रति सजगता, गंभीरता व जिम्मेवारी पैदा हुई है। तस्वीर का दूसरा पहले नुकसानदेह साबित हुआ कि युवा नेता राजनीति को जनसेवा समझने की बजाए मलाइदार पदों पर विराजमान होने के लिए तरह-तरह की मांग करने लगे। जिस कारण पुराने व नए नेताओं के बीच मनमुटाव पैदा हो रहा है।

    विशेष रूप से जब सख्त अनुशासन न हो या कार्रवाई में देरी हो तब बात बड़े स्तर पर बिगड़ जाती है। पार्टियां यह दलील देती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के चलते पार्टियों के भीतर मतभेद होना स्वाभाविक है। जहां तक राजस्थान का मामला है, यह खींचतान भी पुराने नेताओं व यूथ के बीच जारी है। कई बार खींचतान के चलते पार्टियों को नुकसान भी हुआ है। पंजाब कांग्रेस इसका उदारहण है। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह बनाम नवजोत सिद्धू के बीच खींचतान के कारण विधानसभा चुनावों में पार्टी को खूब किरकिरी हुई। कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो गए। ऐसा ही मध्य प्रदेश में घटित हुआ, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत से कमलनाथ सरकार गिर गई।

    राजस्थान की मौजूदा परिस्थितियां भी पंजाब जैसी बनी हुई हैं। कांग्रेस में दूसरे गुट के नेता सचिन पायलट पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर शाब्दिक प्रहार करते रहे, फिर भूख हड़ताल पर बैठे और अब उन्होंने यात्रा शुरु करने का ऐलान कर दिया है। यह घटना कांग्रेस हाईकमान के लिए चुनौती बन हुई है। वास्तव में सभी पार्टियों को चाहिए कि वे अपने नेताओं को अनुशासन सिखाएं और उन्हें राजनीति के मूल उद्देश्यों से परिचित करवाएं। उन्हें बताया जाना चाहिए कि राजनीति कोई पैसा कमाने का धंधा नहीं बल्कि जनसेवा है। पुराने नेताओं को भी चाहिए किसी लालच में न रहकर वे नए व युवा नेताओं को अवसर व सम्मान दें, ताकि राजनीति में नई विचारधारा से विकास को गति दी जा सके।

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