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    गुरु द्रोण की नगरी में उनके नाम का ना कोई चौक-चौराहा, ना म्यूजियम

    Gurugram News
    Gurugram News : गुरुग्राम में ओल्ड व न्यू रेलवे रोड के बीच गुरु द्रोणाचार्य तालाब, जिसके चारों तरफ हो चुके हैं कब्जे।

    गुरु द्रोणाचार्य का शहर है गुरुग्राम, कौरवों, पांडवों को दी थी अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा

    • सरकारी तौर पर उनके नाम से ना कोई चौक-चौराहा, ना सड़क, ना कोई इमारत

    गुरुग्राम (सच कहूँ/संजय कुमार मेहरा)। Gurugram News: महाभारत कालीन शहर गुरुग्राम। यहां गुरु द्रोणाचार्य ने कौरवों-पांडवों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी थी। राजा युधिष्ठिर ने अपने धर्मगुरु द्रोणाचार्य को गुरुग्राम उपहार स्वरूप दिया था। सैंकड़ोंं फॉर्च्यून कंपनियों, गगनचुम्बी इमारतों के इस शहर में गुरु द्रोणाचार्य के नाम से सरकारी स्तर पर ना कोई चौक, ना चौराहा, ना सड़क और ना कोई इमारत है। नई पीढ़ियों को इस शहर के इतिहास के बारे में दिखाने के लिए कुछ नहीं है। समय के साथ इस शहर ने करवट ली और विकास की दृष्टि से दुनिया के मानचित्र पर आ गया। यहां की पौराणिकताओं में महाभारत काल से गुरु द्रोणाचार्य का नाम है। उनके द्वारा दी गई शिक्षा-दीक्षा से ही कौरव-पांडव अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण हुए। Gurugram News

    उनके सर्र्वश्रेष्ठ धनुर्धारी शिष्य अर्जुन रहे, जिन्होंने पानी की परछाई में मछली की आंख पर निशाना लगाकर तीर मारा था। यह सिर्फ अर्जुन की ही प्रतिभा नहीं थी, बल्कि गुरु द्रोणाचार्य द्वारा दी गई शिक्षा का भी प्रदर्शन था। गुरु द्रोण को पांडवों द्वारा गुरुग्राम दान में दिया गया था। गुरुग्राम में गुरु द्रोणाचार्य के नाम से एक पौराणिक तालाब है। यह तालाब शुरूआत में तो काफी ज्यादा क्षेत्रफल में फैला था, लेकिन समय के साथ इस पर कब्जे होते गए। आज यह 8-10 एकड़ का ही रह गया है। तालाब के चारों तरफ रहने वाले लोगों ने इस पर कब्जे कर लिए हैं। इसी क्षेत्र में संकरी गली में गुरु द्रोणाचार्य का एक मंदिर भी है। उसमें गुरु द्रोणाचार्य के अलावा अन्य देवी-देवताओं की भी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

    यह मंदिर सिर्फ एक ही कालोनी या क्षेत्र का बनकर रह गया है। आम जनता, बच्चों को गुरु द्रोणाचार्य का इतिहास बताने के नाम पर मंदिर में और कुछ नहीं है। न्यू रेलवे रोड पर गुरु द्रोणाचार्य के नाम से सरकारी कालेज जरूर है। इसे भी सार्वजनिक तौर पर नहीं कहा जा सकता। गुरुग्राम में जब दिल्ली मेट्रो का पर्दार्पण हुआ तो एमजी रोड पर दिल्ली-गुरुग्राम के बीच के पहले मेट्रो स्टेशन को गुरु द्रोणाचार्य स्टेशन नाम दिया गया। तालाब, मंदिर, कालेज और मेट्रो स्टेशन ऐसे स्थल हैं, जो सिर्फ नाम के ही हैं। यहां गुरु द्रोणार्य के नाम से ना तो कोई पार्क है, जिसमें प्रतिमा लगाकर उनका जीवन परिचय दिया गया हो। ना कोई म्यूजियम है, जिसमें उनके बारे में अगली पीढ़ियां जानकारी ले सकें। ना कोई चौक-चौराहा, ना उनकी प्रतिमा, ना कोई म्यूजियम, जहां उनके बारे में कुछ जानकारी अंकित है।

    माता शीतला कृपी के रूप में थीं गुरु द्रोण की पत्नी | Gurugram News

    इतिहास में अंकित है कि माता शीतला गुरु द्रोणाचार्य की पत्नी थी। उनका महाभारत काल में नाम कृपी थी। जिनका गुरुग्राम में ही भव्य मंदिर है। देशभर से लोग यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं। जब महाभारत के युद्ध में गुरु द्रोणाचार्य वीरगति को प्राप्त हुए थे तो उनकी पत्नी कृपी सोलह श्रृंगार करके चिता में बैठ गईं। सती होने से पहले उन्होंने आशीर्वाद देकर कहा था कि जो भी उनके सती स्थल पर अपनी मनोकामना लेकर आएगा, वह पूरी होगी। इसके बाद 17वीं शताब्दी में राजा भरपूर ने गुड़गांव में माता कृपी के सती होने के स्थान पर मंदिर की स्थापना करने के साथ सवा किलो सोने से उनकी मूर्ति बनवाई। उन्हें शीतला माता नाम दिया गया।

    गुरु द्रोणाचार्य के तालाब पर चारों तरफ से हो गए हैं कब्जे

    गुरु द्रोणाचार्य के तालाब का अस्तित्व बचाने में जुटे वेद प्रचार मंडल के समक्ष अधिकारियों ने दावे तो इस तालाब की कायापलट के किए, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ काम नहीं हुआ। मंडल के महामंत्री व अन्य पदाधिकारी ग्रीवेंस कमेटी की बैठक में भी तालाब पर से कब्जे हटवाने का मुद्दा उठा चुके हैं, लेकिन कार्यवाही के नाम पर खानापूर्ति भी नहीं हुई। मंडल के महामंत्री जोगेंद्र सिंह बताते हैं कि कुरुक्षेत्र में महाभारत काल से जुड़ा बहुत कुछ है, लेकिन गुरुग्राम में कुछ नहीं। बार-बार अनुरोध के बाद नगर निगम ने तालाब के जीर्णाेद्धार के लिए करीब 7 करोड़ का बजट पास किया था।

    अभी तक इस तालाब की मात्र चाहरदीवारी ही बनी है। वह भी बिना कब्जे हटाए। जहां-जहां पर लोगों ने कब्जे किए हुए हैं, वहां से दीवार को घुमावदार बनाया गया है। जोगेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार, प्रशासन गुरुग्राम शहर में कोई म्यूजियम बनाए, उनकी प्रतिमाएं लगवाए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति का गौरव का ज्ञान ले सकें।

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