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    निजता के अधिकार पर ‘‘आधार’’ से मिलती गंभीर चुनौती

    aadhar Card

    आधार कार्ड और निजी डेटा सुरक्षा का मामला पुन: गर्म हो गया है। ट्राई चैयरमैन आर एस शर्मा ने आधार की सुरक्षा का पुख्ता दावा करते हुए अपना 12 अंकों का आधार नंबर जारी करते हुए कहा था कि अगर इससे सुरक्षा से जुड़ा कोई खतरा है,तो कोई मेरे आँकड़े लीक करके दिखाए और उनकी इस चुनौती के कुछ घंटे बाद ही आँकड़े लीक हो गए। एक फ्रांसीसी सुरक्षा विशेषज्ञ ने ट्वीट्स की श्रृखंला में शर्मा के निजी जीवन के कई आँकड़े, उनके 12 अंकों की आधार की संख्या से जुटाकर जारी कर दिए,जिनमें शर्मा का निजी पता,जन्मतिथि, वैकल्पिक फोन नंबर आदि शामिल है। इस फ्रांसीसी सुरक्षा विशेषज्ञ ने लिखा कि आधार असुरक्षित है,लोग आपके निजी जीवन के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं।

    अब आधार जारी करने वाली संस्था भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण अर्थात यूआईडीएआई ने ट्राई प्रमुख शर्मा का बचाव करते हुए कहा है कि शर्मा की व्यक्तिगत जानकारी आधार डेटाबेस अथवा उसके सर्वर से नहीं ली गई है, अपितु यह जानकारी गूगल सर्च के आधार पर ली गई है। स्पष्ट है कि यूआईडीएआई भले ही शर्मा के बचाव में आई हो,परंतु यह बचाव भी काफी कमजोर है। निजी डेटा सुरक्षा के कई मामले देश में लगातार सामने आ रहे हैं। आधार आम लोगों की पहचान संख्या है, जिसके लिए सरकार लोगों की बायोमेट्रिक पहचान जुटा रही है।आम लोगों की बायोमेट्रिक पहचान से जुड़ी जानकारी के डेटाबेस की सुरक्षा और आम लोगों की निजता भंग होने के खतरे को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं।

    भारत का बायोमेट्रिक डेटाबेस दुनिया का सबसे बड़ा डेटाबेस है। बीते 8 सालों में सरकार एक अरब से ज्यादा लोगों की उंगलियों के निशान और आँखों की पुतलियों के निशान जुटा चुकी है। सरकार यह भरोसा दे रही है कि बायोमेट्रिक डेटा सुरक्षित ढंग से इनक्रिप्टेड रूप से संग्रहित हैं। लेकिन छात्रों, पेंशन और जनकल्याण योजनाओं का लाभ लेने वालों की जानकारियां दर्जनों सरकारी वेबसाइट पर आ चुकी है।यहाँ तक कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान धोनी की निजी जानकारी भी एक उत्साही सर्विस प्रोवाइडर द्वारा गलती से ट्वीट की जा चुकी है। इसके बाद भारत के सेंटर फोर इंटरनेट एंड सोसायटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक चार अहम सरकारी योजनाओं के तहत आने वाले ,13 से 13.5 करोड़ आधार नंबर ,पेंशन और मनरेगा में काम करने वाले 10 करोड़ बैंक खातों की जानकारी आॅनलाइन लीक हो चुकी है।

    सरकार जिस तरह विभिन्न डेटाबेस के आँकड़ों को आपस में जोड़ रही है,उससे आँकड़ों के चोरी होने और लोगों के निजता भंग होने का खतरा बढ़ा है। सरकार खुद भी यह स्वीकार कर चुकी है कि करीब 34 हजार सर्विस प्रदाताओं को या तो ब्लैक लिस्ट कर दिया गया है या फिर सस्पेंड किया गया है,जो उचित प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं और फर्जी पहचान पत्र बना रहे हैं। 2015 में हैकरों ने अमेरिकी सरकार के नेटवर्क से करीब 50 लाख लोगों के फिंगरप्रिंट को हैक कर लिया था। ऐसे में भारतीय बायोमेट्रिक डेटाबेस की सुरक्षा पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भारत में सरकार डेटा सुरक्षा के लिए डेटा प्रोटेक्शन लॉ लाने की तैयारी कर रही है। लेकिन इसकी प्रक्रिया काफी धीमी है,जबकि डेटा सुरक्षा की चुनौतियाँ बढ़ती ही जा रही हैं।

    बीते कुछ सालों के दौरान आधार संख्या का दबदबा इतना बढ़ा है कि इसने लोगों के जीवन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।जनवितरण प्रणाली के अंतर्गत राशन का वितरण आधार के द्वारा किया जा रहा है। इसके कारण झारखंड में कई स्थानों पर लोगों को राशन नहीं मिल पाया। इस कारण झारखंड में भूख से लोगों की मृत्यु तक हो गई।इसी तरह राजस्थान के कई हिस्सों में भी लोगों के उंगलियों के निशान का मिलान न होने के कारण राशन नहीं मिल पाया। मजदूरों द्वारा कठोर श्रम के कारण उनके उंगलियों के निशान भी मिट चुके हैं,ऐसे में उनके राशन का वितरण भी प्रभावित हो चुका है। वास्तव में कई मामलों में आधार की अनिवार्यता लोगों के जीवन को भी लील रही है।यह भी तब हो रहा है,जब सुप्रीम कोर्ट बार-बार आधार के अनिवार्यता को वैकल्पिक बनाने के आदेश दे रही है। देश भर में चलाई जा रही 1200 जनकल्याण योजनाओं में 500 से ज्यादा योजनाओं के लिए आधार अनिवार्य हो चुका है।

    यहाँ तक कि बैंक और प्राइवेट फॉर्म भी अपने ग्राहकों के सत्यापन के लिए आधार का प्रयोग कर रहे हैं। आधार को जबरन मोबाइल फोन, बैंक खाते, टैक्स फाइलिंग, स्कोलरशिप, पेंशन, राशन, स्कूल एडमिशन और स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े इत्यादि जोड़ने की कोशिश से लोगों की निजी जानकारी लीक होने का खतरा बढ़ता जा रहा है।पिछले वर्ष 40,000 किसानों को उनके बर्बाद हुए फसल का मुआवजा इसलिए नहीं मिल सका, क्योंकि बैंक में इन किसानों के आधार नंबर गलत दर्ज किए गए थे।

    माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने ‘‘निजता के अधिकार”को मूल अधिकार के रूप में स्वीकार किया है। वास्तविकता में आधार अपने मौजूदा रूप में मौलिक अधिकार के लिए एक गंभीर खतरा है।यह एक आम धारणा है कि ‘आधार’ से जुड़ी हुई निजता संबंधी चिंता ‘‘सेट्रल आइडेंटिटीज डेटा रिपोजिटरी(सीआईडीआर)’’ की गोपनीयता से संबंधित है। ये धारणा दो कारणों से भ्रामक है;पहली बात सीआईडीआर की कल्पना कहीं भी तालाबंद आलमारी की तरह नहीं की गई है। इसके उलट, आधार अधिनियम 2016 सीआईडीआर की ज्यादातर जानकारियों को साझा करने का एक ढ़ांचा प्रदान करता है। दूसरा कारण, सबसे बड़ा खतरा वैसे भी यहां नहीं, कहीं और है।

    आॅथेंटिकेशन के तहत आग्रह करने वाली इकाई के साथ पहचान संबंधी सूचनाओं को साझा करने की संभावना का दरवाजा खोल दिया गया है। निजता के सवाल पर पहचान संबंधी सूचनाओं का प्रसार और उनका संभावित दुरुपयोग ही आधार से जुड़ी एकमात्र चिंता नहीं है।इससे कहीं बड़ा खतरा यह है कि आधार निजी सूचनाओं को खोद कर बाहर निकालने और उन्हें जमा करने का एक अकल्पनीय ताकतवर औजार है। एक उदाहरण देकर इस बात को समझाया जा सकता है। मान लीजिए कि रेलवे टिकट खरीदने के लिए आधार संख्या को अनिवार्य बना दिया जाता है। इसका मतलब होगा कि जन्म के बाद आपकी हर यात्रा का सारा ब्यौरा सरकार के पास होगा।इसी तरह आधार को सिमकार्ड खरीदने के लिए अनिवार्य कर दिए जाने से आपके जीवन भर के कॉलरिकॉर्ड तक सरकार की पहुँच हो जाएगी।इस तरह से आधार व्यक्ति की निजी सूचनाएँ हासिल करने का एक अभूतपूर्व ताकतवर औजार है।

    इन सबके बीच ही निजी एजेंसियों की स्थिति कैसी है? उदाहरण के लिए रिलायंस जियो के पास 10 करोड़ से ज्यादा भारतीयों की पहचान संबंधी सूचनाएँ हैं, जिसे उन्होंने सीआईडीआर से निकाला है। जियो सिम कार्ड खरीदने के लिए जब कोई ग्राहक खुद को आॅथेंटिकेट करता है,तो यह सूचना रिलायंस के पास भी जाती है। अगर इस डेटाबेस में जियो के एप्लिकेशनों के रिकॉर्ड से जोड़ दिया जाए तो यह किसी सोने के खदान से कम नहीं होगा, जो ‘बिग डेटा’ एनालिस्टों के लिए एक ख्वाब की तरह है। संक्षेप में, निजता को मौलिक अधिकार मानने के सिद्धांत पर आधारित होने की जगह, आधार वास्तव में निजता के अधिकार के विरोध में खड़ा है।संभव है, इसमें कुछ और रक्षा उपाय जोड़ दिए जाएं, मगर निजी सूचनाएं खोद कर निकालने की ‘आधार’ की शक्ति पर अंकुश लगाना कठिन है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रौशनी में आधार की बुनियाद पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है।

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