एक विश्व शक्ति के रूप में भारत की कल्पना?

India as World Power

रक्षा क्षेत्र में भारत की सेना विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। हमारी सेना एक पेशेवर सेना है है जो युद्ध के लिए तैयार है। सेना को निर्णय न लेने वाले नेताओं ने नीचा दिखाया है। इस बारे में अनेक अध्ययन हुए हैं कि 1947, 1962 और यहां तक कि 1971 में किस तरह सेना के शौर्य और बहादुरी को नजरंदाज किया गया। किंतु केवल सर्वश्रेष्ठ सेना होने से कोई देश महाशक्ति नहीं बन सकता है। जब तक कि वह सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सैन्य कार्यवाहियों में शामिल नहीं होती है जैसा कि मध्य पूर्व और अफगानिस्तान में अमरीकी सेना कर रही रही और ऐसा करने के लिए हमारी अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होनी चाहिए।

हाल के वर्षों में विशेषज्ञों और पर्यवेक्षकों ने 21वीं सदी में भारत के एक महाशक्ति के रूप में उभरने की भविष्यवाणी की किंतु महामारी और उससे पहले से देश की आर्थिक वृद्धि में गिरावट ने ऐसी चचार्ओं पर विराम लगा दिया था। बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भविष्यवाणी की है कि वर्ष 2021-22 में भारत की वृद्धि दर 11.5 प्रतिशत रहेगी और इस भविष्यवाणी के साथ भारत द्वारा पुन: विश्व में बड़ी शक्तियों के समकक्ष आने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। किंतु साथ ही गणतंत्र दिवस के पवित्र अवसर पर जो कुछ भी घटनाएं हुई वे दशार्ती हैं कि भारत के एक बडी शक्ति बनने के मार्ग में क्या-क्या बाधाएं हैं। हमें भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और रक्षा के वायदों और वास्तविक कार्य निष्पादन के बारे में एक नजर डालनी होगी क्योंकि ये चारों चीजें एक महाशक्ति के स्तंभ हैं।

महाशक्ति में परिपक्व राजनीति, सौहार्दपूर्ण समाज, सुदृढ़ अर्थव्यवस्था अ‍ैर सुदृढ़ रक्षा ढांचा होता है और ये चारों चीजें मिलकर उस देश को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थिति पर पहुंचाती है और उसका वर्चस्व स्थापित करती है। अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, सबसे सुदृढ़ सेना है और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं है इसलिए उसे महाशक्ति कहा जाता है। पूर्व सोवियत संघ सैनिक क्षमता के मामले में अमरीका के समकक्ष था किंतु अब सैनिक शक्ति के साथ-साथ आर्थिक शक्ति चीन अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में किसी देश के प्रभाव का पैमाना बन गया और इसीलिए अब विघटित सोवियत संघ का स्थान चीन ने ले लिया है जो आज विश्व की दूसरी सबसे बडी शक्ति बन गया है। विश्व में छाई इस विनाशक महामारी के मद्देनजर किसी देश की शक्ति और प्रभाव में फार्मा उद्योग भी जुड़ गए हैं और इन मायनें में भारत आगे बढ़ सकता है क्योंकि उसने रिकार्ड समय में दो वैक्सीनों का उत्पादन किया है और अन्य देशों को इसकी आपूर्ति आरंभ कर दी है।

फार्मा क्षेत्र के अलावा प्रौद्योगिकी में नवाचार भी इस संबंध में मदद करेगा। भारत इस संबंध में विश्व शक्तियों से प्रतिस्पर्धा कर सकता है। भारत का समाज परंपरागत रहा है जहां पर बहुलवाद और मिल-जुल कर रहने के मूल्य हैं। यहां पर ऐतिहासिक, सांस्कतिक अंतर-निहित विषमताएं हैं जिन्हें हम विविधताएं कहते हैं किंतु आधुनिकीकरण, औद्योगिकीकरण और शिक्षा के विस्तार के साथ ऐसी विषमताएं कम होती जा रही हैं। भारत में आज चीन और अमरीका के बाद सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है। अद्यतन आंकडों के अनुसार देश में 17937 संस्थान, 348 विश्वविद्यालय, 17625 कॉलेज हैं। भारत में सबसे अधिक डॉक्टर, इंजीनियर, और साफ्टवेयर पेशेवर बनते हंै जो देश और विश्व के अन्य देशों में सेवा करते हैं। किंतु जब समाज में धु्रवीकरण होता है तो इससे देश कमजोर हो जाता है और पिछले चार वर्षों में अमरीका में भी यही देखने को मिला। धु्रवीकरण से तत्काल चुनावी लाभ मिलता है किंतु दीर्घकाल में इससे समाज में मतभेद पैदा होते हैं।

अमरीका अब इन घावों पर मलहम लगाने की बात कर रहा है। अमरीका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन ने एकता का नारा दिया है और वही रणनीति अपनायी है। 20 जनवरी को उद्घाटन भाषण में उन्होंने एकता शब्द का प्रयोग कम से कम 20 बार किया है। यह दृष्टिकोण कितना व्यावहारिक है? लोकतंत्र में विमत का आदर किया जाता है और विविधता का सम्मान किया जाता है। विचारों, पहल और विचारधारा की एकता लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है और इस मामले में हमारा देश बेहतर है क्योंकि हम इसे अनेकता में एकता कहते हैं। नि:संदेह हम चाहते हैं कि कानूनों का पालन करने में, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में संस्थागत निष्ठा और देश को बाहरी आक्रमण से बचाने के मामले में हम एकता का पालन करें। लोकतंत्र में संवाद अपरिहार्य है।

यह पराजित और विजेता के बीच दुर्भावना को समाप्त करने में सहायता करता है। इस संबंध में हमने देखा है कि अनेक लोग देश में सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन कानून और हाल ही में कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं। हमने विरोध प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने का प्रयास किया। इसका परिणाम बुरा हुआ और गणतंत्र दिवस के अवसर भी हिंसा जैसी घटनाएं सामने आई। इन हिंसक घटनाओं में एक किसान की मौत हो गयी और अनेक पुलिसकर्मी घायल हुए। किसी देश की शक्ति का पैमाना यह है कि वह अपने आंतरिक विरोधाभासों अ‍ैर घटनाओं को किस तरह संभालता है। अर्थव्यवस्था किसी देश की शक्ति का एक नया पैमाना बन गई है।

शायद हमने वर्ष 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की महत्वाकांक्षा को त्याग दिया है जिसका कि प्रधानमंत्री ने वायदा किया था। वर्तमान सरकार कोे अर्थव्यवस्था, रोजगार और समतापूर्ण विकास को उच्च प्राथमिकता देनी चाहिए तभी वह चीन पर अंकुश रख सकता है और उसके साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है। कुल मिलाकर एक महाशक्ति बनने के लिए आर्थिक शक्ति, सामाजिक पूंजी, प्रौद्योगिकी क्षमता, रक्षा क्षेत्र में सुदृढ़ता आदि आवश्यक है। हमरे यहं ये सारे तत्व मौजूद हैं किंतु हमें उनका सही उपयोग करना होगा। और ऐसा करने के लिए एक देश के रूप में हमारी सोच में आमूल-चूल बदलाव की आवश्यकता है।

एक देश के रूप मे हम क्या करना चाहते हैं? वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारण अच्छी है और इस संबंध में हमारे देश ने विश्व को बहुत सारा ज्ञान दिया है किंतु हम यह समझने में विफल रहे हैं कि बुद्धि विवेक को भी शक्ति ही वैधता देती है। आज विश्व में लोग हिन्दू और भारतीय परंपराओं को सीखने के बजाय अमरीकन प्रौद्योगिकी और चीनी संस्कृति को अधिक सीखते हैं। डेविड श्वार्ट्ज ने अपनी पुस्तक मैजिक आॅफ थिंकिंग बिग में कहा है, ‘आप जो सोचते हैं वही आप हो।’ इसका तात्पर्य है कि हमें एक महाशक्ति के रूप में सोचना शुरू करना चाहिए और उसी के अनुसार हमारा व्यवहार भी बदलेगा और हम एक महाशक्ति बन जाएंगे। हमें अन्य देशों के लिए एक उदाहरण बनना होगा।

                                                                                                                   -डॉ. डीके गिरी

 

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